स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की मुश्किलें बढ़ने के आसार, हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में दी गई चुनौती

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की मुश्किलें बढ़ने के आसार, हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में दी गई चुनौती

द फ्रंट डेस्क: ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़ा मामला अब एक बड़े कानूनी मोड़ पर पहुंच गया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट से मिली अग्रिम जमानत को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दिए जाने के बाद यह मामला और गंभीर हो गया है। अगर सुप्रीम कोर्ट इस याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार करता है, तो न केवल शंकराचार्य की मुश्किलें बढ़ सकती हैं, बल्कि पूरे केस की दिशा भी बदल सकती है। यह मामला पहले से ही संवेदनशील है, क्योंकि इसमें नाबालिगों से जुड़े गंभीर आरोप शामिल हैं। ऐसे में अब देश की सबसे बड़ी अदालत का रुख बेहद अहम माना जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला

इस पूरे मामले में शिकायतकर्ता और श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति निर्माण ट्रस्ट के अध्यक्ष आशुतोष ब्रह्मचारी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा दी गई अग्रिम जमानत को चुनौती देते हुए इसे रद्द करने की मांग की है। याचिका में यह तर्क दिया गया है कि हाईकोर्ट ने जमानत देते समय मामले की गंभीरता और उपलब्ध साक्ष्यों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। शिकायतकर्ता पक्ष का कहना है कि इस तरह के गंभीर आरोपों वाले मामले में जमानत देने से जांच प्रभावित हो सकती है। उनके वकीलों का मानना है कि न्यायिक प्रक्रिया के तहत इस फैसले की समीक्षा जरूरी है, ताकि सच्चाई सामने आ सके और कानून के अनुसार उचित कार्रवाई हो।

हाईकोर्ट से मिली थी राहत

इससे पहले 25 मार्च को इलाहाबाद हाईकोर्ट की सिंगल बेंच, जिसकी अध्यक्षता जस्टिस जितेंद्र कुमार सिन्हा कर रहे थे, ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्य मुकुंदानंद को अग्रिम जमानत दी थी। कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ गिरफ्तारी से राहत दी थी, जिससे दोनों को तत्काल गिरफ्तारी से बचाव मिल गया। हाईकोर्ट के इस फैसले को आरोपियों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा था, क्योंकि इससे उन्हें जांच के दौरान गिरफ्तारी का डर नहीं रहा। हालांकि अब इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दिए जाने के बाद यह राहत अस्थायी हो सकती है। अगर सुप्रीम कोर्ट इस आदेश पर रोक लगाता है या इसे रद्द करता है, तो स्थिति पूरी तरह बदल सकती है।

क्या हैं आरोप

यह मामला बेहद गंभीर आरोपों से जुड़ा हुआ है। शिकायतकर्ता आशुतोष ब्रह्मचारी ने आरोप लगाया है कि माघ मेला 2026 और महाकुंभ 2025 के दौरान मठ में रहने वाले नाबालिग बटुकों के साथ कथित यौन उत्पीड़न किया गया। इन आरोपों ने पूरे धार्मिक और सामाजिक तंत्र को झकझोर कर रख दिया है। नाबालिगों से जुड़े मामलों को लेकर कानून पहले से ही सख्त है, ऐसे में यह मामला और संवेदनशील हो जाता है। इन आरोपों के आधार पर प्रयागराज की विशेष पॉक्सो कोर्ट ने पुलिस को एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया था। इसके बाद झूंसी थाना पुलिस ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्य मुकुंदानंद के खिलाफ मामला दर्ज किया।

पुलिस जांच और कानूनी प्रक्रिया

एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू की। जांच के दौरान कई पहलुओं पर काम किया जा रहा है, जिसमें आरोपों की सत्यता, पीड़ितों के बयान और अन्य सबूत शामिल हैं। गिरफ्तारी की आशंका को देखते हुए आरोपियों ने अग्रिम जमानत के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया था, जहां से उन्हें राहत मिल गई थी। हालांकि अब जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है, तो जांच की दिशा और कानूनी प्रक्रिया दोनों पर इसका असर पड़ सकता है। अगर सुप्रीम कोर्ट जमानत को रद्द करता है, तो पुलिस आगे की कार्रवाई तेज कर सकती है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी नजर

फिलहाल इस पूरे मामले में सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हुई हैं। यह देखना अहम होगा कि कोर्ट इस याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार करता है या नहीं। अगर सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करता है, तो शंकराचार्य और उनके शिष्य की मुश्किलें बढ़ सकती हैं और गिरफ्तारी का रास्ता साफ हो सकता है। वहीं अगर हाईकोर्ट का आदेश बरकरार रहता है, तो उन्हें फिलहाल राहत मिलती रहेगी। इस मामले का फैसला न केवल कानूनी रूप से महत्वपूर्ण होगा, बल्कि इसका सामाजिक और धार्मिक प्रभाव भी व्यापक हो सकता है। आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई इस केस की पूरी दिशा तय करेगी और यह भी साफ करेगी कि कानून ऐसे संवेदनशील मामलों में किस तरह संतुलन बनाता है।

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