बंगाल में 34 साल राज करने वाली वामपंथी पार्टी कैसे हो गई ‘जीरो’? ‘लाल झंडे’ के पतन की पूरी कहानी

बंगाल में 34 साल राज करने वाली वामपंथी पार्टी कैसे हो गई ‘जीरो’? ‘लाल झंडे’ के पतन की पूरी कहानी

द फ्रंट डेस्क: पश्चिम बंगाल की राजनीति में कभी वामपंथी दलों का एकछत्र राज हुआ करता था। 34 साल तक ‘लाल झंडा’ सत्ता का प्रतीक बना रहा और राज्य की राजनीतिक दिशा तय करता रहा। लेकिन 2011 में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के उभार के साथ यह दौर खत्म हुआ।
दिलचस्प बात यह है कि सत्ता से बाहर होने के बावजूद CPM के पास उस समय करीब 40% वोट बैंक मौजूद था, जो किसी भी विपक्षी दल के लिए मजबूत आधार माना जाता है। लेकिन बीते एक दशक में हालात तेजी से बदले और यह मजबूत जनाधार धीरे-धीरे बिखरता चला गया। आज स्थिति यह है कि वामपंथी दल चुनावी राजनीति में लगभग अप्रासंगिक हो चुके हैं।

40% से 5% तक वोट बैंक में बड़ी गिरावट

2011 के बाद CPM का चुनावी प्रदर्शन लगातार गिरावट की ओर गया। 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का वोट शेयर करीब 23% तक सिमट गया, जो पहले के मुकाबले काफी कम था। इसके बाद 2016 के विधानसभा चुनाव में भी यह गिरावट जारी रही और पार्टी करीब 20% वोट शेयर तक सीमित रह गई। सबसे बड़ा झटका 2019 के लोकसभा चुनाव में लगा, जब CPM का वोट शेयर गिरकर लगभग 6% रह गया। यह वही समय था जब पार्टी का पारंपरिक वोट बैंक तेजी से खिसक रहा था। 2021 के विधानसभा चुनाव में तो स्थिति और गंभीर हो गई—वामपंथी गठबंधन का वोट शेयर महज 5% पर आ गया और पार्टी एक भी सीट जीतने में सफल नहीं हो सकी। यह गिरावट सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह इस बात का संकेत थी कि पार्टी का जनाधार पूरी तरह कमजोर हो चुका है और मतदाता नए विकल्पों की ओर बढ़ चुके हैं।

BJP को मिला वाम वोटों का फायदा

वामपंथी दलों के कमजोर होने से जो राजनीतिक खालीपन पैदा हुआ, उसे भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने तेजी से भरा।
2019 के लोकसभा चुनाव में BJP ने बंगाल में ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए 18 सीटें जीत लीं और अपना वोट शेयर कई गुना बढ़ा लिया। विश्लेषकों का मानना है कि यह उछाल केवल BJP के संगठन की वजह से नहीं था, बल्कि इसमें वामपंथी वोटरों का भी बड़ा योगदान था। TMC के खिलाफ असंतोष रखने वाले कई मतदाता, जो पहले वामपंथ के साथ थे, उन्होंने BJP को एक मजबूत विकल्प के रूप में देखा और अपना समर्थन वहां शिफ्ट कर दिया। इस तरह, वामपंथी दलों के कमजोर होने का सबसे बड़ा फायदा BJP को मिला, जिसने खुद को राज्य की प्रमुख विपक्षी ताकत के रूप में स्थापित कर लिया।

सत्ता की आदत और जमीनी संघर्ष की कमी

लगातार 34 साल तक सत्ता में रहने का असर वामपंथी दलों की कार्यशैली पर भी पड़ा।
पार्टी के नेताओं और कैडरों में धीरे-धीरे सत्ता की आदत बन गई, जिससे जमीनी स्तर पर संघर्ष करने की क्षमता कमजोर होती चली गई। जब 2011 के बाद TMC ने गांव-गांव और बूथ स्तर तक अपनी पकड़ मजबूत की, तब CPM के लिए उस मुकाबले में टिकना मुश्किल हो गया। कई राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पार्टी ने अपनी सबसे बड़ी ताकत—सड़क पर संघर्ष और जनआंदोलन—को खो दिया, जो कभी उसकी पहचान हुआ करती थी। इस कमजोरी का फायदा विरोधी दलों ने उठाया और वामपंथी संगठन धीरे-धीरे बिखरने लगा।

पार्टी और सरकार के बीच की रेखा धुंधली

वामपंथी शासन के लंबे दौर में एक और बड़ी समस्या उभरकर सामने आई—पार्टी और सरकार के बीच की दूरी खत्म होना।
समय के साथ प्रशासनिक फैसलों में पार्टी का दखल बढ़ने लगा, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल उठने लगे। इसके अलावा, सिंगूर और नंदीग्राम जैसे मुद्दों ने वामपंथी सरकार की छवि को गहरा नुकसान पहुंचाया। इन घटनाओं ने न केवल जनता के बीच असंतोष बढ़ाया, बल्कि पार्टी के खिलाफ एक मजबूत जनमत भी तैयार किया, जिसका सीधा फायदा TMC को मिला। धीरे-धीरे यह धारणा बन गई कि पार्टी ही सरकार बन चुकी है और यही उसकी गिरावट का कारण भी बनी।

जनता से दूरी और युवाओं की अनदेखी

सत्ता से बाहर होने के बाद CPM के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को फिर से खड़ा करने की थी, लेकिन इस दिशा में अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी। पार्टी का जनता से सीधा संपर्क कमजोर होता गया और जमीनी स्तर पर सक्रियता घटती चली गई। इसके साथ ही, युवाओं को पर्याप्त अवसर न मिलने से पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ने लगा। कई युवा नेता, जो पार्टी का भविष्य माने जाते थे, उन्होंने संगठन छोड़कर अन्य दलों का रुख कर लिया। यह केवल नेतृत्व संकट नहीं था, बल्कि यह इस बात का संकेत भी था कि पार्टी बदलते समय के साथ खुद को ढालने में असफल रही।

पश्चिम बंगाल में वामपंथी दलों का पतन एक दिन में नहीं हुआ, बल्कि यह कई वर्षों में धीरे-धीरे विकसित हुई प्रक्रिया का परिणाम है।
संगठनात्मक कमजोरी, नेतृत्व संकट, बदलते राजनीतिक समीकरण और जनता से दूरी—इन सभी कारकों ने मिलकर ‘लाल झंडे’ को हाशिए पर पहुंचा दिया। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वामपंथी दल खुद को दोबारा खड़ा कर पाएंगे या बंगाल की राजनीति में उनकी भूमिका सीमित ही रह जाएगी।

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