पश्चिम एशिया में जारी युद्ध अब केवल तेल और गैस की कीमतों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसका असर धीरे-धीरे आम लोगों की रसोई तक पहुंचने लगा है। जिस संघर्ष को अब तक ऊर्जा संकट के तौर पर देखा जा रहा था, वह अब वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है। समुद्री व्यापारिक मार्गों पर बढ़ते तनाव, उर्वरकों की सप्लाई में बाधा और बढ़ती परिवहन लागत ने एक ऐसी स्थिति पैदा कर दी है, जहां आने वाले महीनों में दुनिया भर में खाने-पीने की चीजों की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिल सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो इसका असर केवल अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि करोड़ों लोगों की बुनियादी जरूरत—खाना—भी प्रभावित हो सकती है।
पहले तेल, अब रसोई पर संकट
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बढ़ा दी है। शुरुआत में इसका असर तेल और गैस की कीमतों पर दिखा, लेकिन अब यह संकट खाद्य आपूर्ति तक पहुंच चुका है। वर्ल्ड फूड प्रोग्राम (WFP) के अनुसार, यदि हालात जून तक ऐसे ही बने रहते हैं, तो दुनिया में करीब 4.5 करोड़ अतिरिक्त लोग गंभीर भुखमरी की चपेट में आ सकते हैं। यह संख्या पहले से ही संकट में जी रहे 31.9 करोड़ लोगों के आंकड़े को और भयावह बना देगी। इसका मतलब साफ है कि यह सिर्फ एक क्षेत्रीय युद्ध नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर जीवन स्तर को प्रभावित करने वाला संकट बन चुका है।
ईरान युद्ध से कैसे बढ़ रही रसोई की महंगाई
इस पूरे संकट का केंद्र होर्मुज स्ट्रेट है, जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में से एक है। यह संकरा समुद्री रास्ता वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की जीवनरेखा माना जाता है। दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस इसी रास्ते से होकर गुजरता है। ऐसे में जब इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है, तो सबसे पहले असर ऊर्जा कीमतों पर पड़ता है। हाल के घटनाक्रम के बाद कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं। सुरक्षा कारणों से जहाजों को लंबे और सुरक्षित रास्तों से भेजा जा रहा है, जिससे माल ढुलाई की लागत करीब 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ गई है। यह बढ़ी हुई लागत सीधे खेती पर असर डालती है। ट्रैक्टर चलाने, सिंचाई करने, खाद और बीज पहुंचाने से लेकर फसल को बाजार तक लाने तक हर चरण महंगा हो जाता है।
असली खतरा तेल नहीं, उर्वरक संकट
हालांकि चर्चा ज्यादातर तेल की कीमतों पर हो रही है, लेकिन असली खतरा उर्वरकों की कमी है, जो आने वाले समय में खाद्य संकट का मुख्य कारण बन सकता है। दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाले यूरिया का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है और इसका एक बड़ा भाग होर्मुज स्ट्रेट के जरिए ही निर्यात होता है। कतर, जो वैश्विक यूरिया उत्पादन में अहम भूमिका निभाता है, वहां LNG सप्लाई बाधित होने के कारण कई उर्वरक संयंत्रों में उत्पादन रोक दिया गया है। गैस की कमी के चलते भारत में भी कई यूरिया प्लांट्स को उत्पादन घटाना पड़ा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक गैस की उपलब्धता में भारी गिरावट आई है, जिससे उत्पादन पर सीधा असर पड़ा है। बांग्लादेश जैसे देशों में तो स्थिति और गंभीर है, जहां गैस की कमी के कारण कई फैक्ट्रियां बंद हो गई हैं। इसका नतीजा यह है कि उर्वरकों की कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है—हाल के हफ्तों में करीब 40 प्रतिशत और पिछले साल के मुकाबले 60 प्रतिशत तक महंगाई दर्ज की गई है।
गलत समय पर आया संकट
यह संकट ऐसे समय पर आया है जब उत्तरी गोलार्ध में बुवाई का सबसे अहम समय चल रहा है। फरवरी के मध्य से लेकर मई तक का समय खेती के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। इस दौरान किसानों को अधिक मात्रा में खाद की जरूरत होती है ताकि फसल की पैदावार बेहतर हो सके। लेकिन जब खाद महंगी हो या उपलब्ध ही न हो, तो किसान मजबूरी में इसका कम इस्तेमाल करते हैं। इसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ता है। चावल, गेहूं, मक्का और सोयाबीन जैसी बुनियादी फसलों की पैदावार में गिरावट आने की आशंका बढ़ जाती है।
भारत, जो अपनी 40 प्रतिशत से ज्यादा उर्वरक जरूरत मध्य पूर्व से पूरी करता है, इस संकट से सीधे प्रभावित हो सकता है। वहीं ब्राजील जैसे देश, जो पूरी तरह आयातित उर्वरकों पर निर्भर हैं, वहां भी कृषि उत्पादन पर असर पड़ना तय है।
महंगाई का असर आम जनता पर
खेती की लागत बढ़ने और उत्पादन घटने का अंतिम बोझ आम लोगों पर ही पड़ता है। जब बाजार में अनाज की आपूर्ति कम होती है, तो कीमतें तेजी से बढ़ने लगती हैं। इसका असर केवल खाने-पीने की चीजों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। महंगाई बढ़ती है, सरकारों पर सब्सिडी का दबाव बढ़ता है और आम लोगों की जेब पर सीधा असर होता है। भारत जैसे देशों में सरकार को फर्टिलाइजर सब्सिडी पर अधिक खर्च करना पड़ सकता है, जिससे वित्तीय दबाव बढ़ेगा। पहले से ही रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण वैश्विक खाद्य आपूर्ति कमजोर हो चुकी है। अब यह नया संकट उस सिस्टम को और ज्यादा दबाव में डाल रहा है, जो पहले से ही संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रहा था।
क्या दुनिया भुखमरी की ओर बढ़ रही है?
यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो दुनिया एक बड़े खाद्य संकट की ओर बढ़ सकती है। उर्वरकों की कमी, बढ़ती लागत और घटता उत्पादन मिलकर एक ऐसी स्थिति पैदा कर सकते हैं, जहां गरीब और विकासशील देशों में खाद्य सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती बन जाएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर वैश्विक सप्लाई चेन जल्द सामान्य नहीं हुई, तो आने वाले महीनों में कई देशों में खाद्य संकट और भुखमरी की स्थिति गंभीर हो सकती है।
ईरान युद्ध अब केवल तेल या ऊर्जा का संकट नहीं रहा, बल्कि यह धीरे-धीरे वैश्विक खाद्य संकट का रूप लेता जा रहा है। यह घटना यह दिखाती है कि दुनिया की अर्थव्यवस्था और रोजमर्रा की जिंदगी कितनी गहराई से आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भर है। अगर हालात जल्द नहीं सुधरे, तो आने वाले समय में इसका असर सिर्फ बाजार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आम आदमी की थाली तक पहुंचेगा—जहां दाल-रोटी भी महंगी हो सकती है।




