द फ्रंट डेस्क: पश्चिम एशिया में एक बार फिर हालात बेहद तनावपूर्ण हो गए हैं। इजरायल ने अमेरिका के समर्थन के साथ ईरान के तेहरान, क़ोम, खोर्रमाबाद और इस्फ़हान जैसे प्रमुख शहरों पर मिसाइल हमले किए। इन हमलों की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि कार्रवाई रात के अंधेरे में नहीं, बल्कि दिन के उजाले में की गई। सैन्य रणनीति के लिहाज से यह असामान्य कदम माना जा रहा है, क्योंकि आमतौर पर हवाई या मिसाइल हमले अंधेरे में किए जाते हैं ताकि रडार से बचा जा सके और दुश्मन की प्रतिक्रिया क्षमता सीमित रहे। इस बार की रणनीति ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं क्या यह पहले से तय संयुक्त ऑपरेशन था? दिन में हमला करने के पीछे क्या सोच थी? और क्या यह व्यापक युद्ध की शुरुआत हो सकती है?
क्या पहले से तैयार था यह ऑपरेशन?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह हमला अचानक लिया गया फैसला नहीं था। इजरायल और अमेरिका कई महीनों से ईरान के खिलाफ संयुक्त सैन्य कार्रवाई की तैयारी कर रहे थे। सूत्रों का दावा है कि यह एक बहु-स्तरीय संयुक्त अभियान है, जिसमें मिसाइल हमलों के साथ-साथ साइबर हमले और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध की रणनीतियां भी शामिल हैं। बताया जा रहा है कि शुरुआती चरण को चार दिनों तक चलाने की योजना बनाई गई थी। इस अभियान का उद्देश्य ईरान की सैन्य क्षमताओं, कमांड-एंड-कंट्रोल नेटवर्क और संभावित परमाणु प्रतिष्ठानों को कमजोर करना है। कुछ रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि तेहरान में विस्फोट सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के दफ्तर के आसपास हुए, हालांकि इस बारे में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है कि उस समय वे वहां मौजूद थे या नहीं।

दिन के उजाले में हमला: रणनीतिक कारण
दिन में हमला करना एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, ईरान को दिन के समय बड़े पैमाने पर हमले की आशंका कम रही होगी, क्योंकि अधिकतर सैन्य बल रात में उच्च सतर्कता की स्थिति में रहते हैं। ऐसे में दिन में कार्रवाई कर प्रतिक्रिया समय को सीमित करने की कोशिश की गई। आधुनिक गाइडेड मिसाइल और ड्रोन सिस्टम दिन के उजाले में बेहतर दृश्य पुष्टि के साथ अधिक सटीक लक्ष्यभेदन कर सकते हैं। इससे ऑपरेशन की प्रभावशीलता बढ़ती है। इसके अलावा, दिन में हमला मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी डालता है। आम नागरिकों में घबराहट बढ़ती है और विरोधी देश की मानसिक तैयारी पर असर पड़ता है। इसे खुला शक्ति प्रदर्शन भी माना जा सकता है एक ऐसा संदेश कि कार्रवाई छिपकर नहीं, बल्कि खुले तौर पर की जा रही है।
ट्रंप का रुख और अमेरिका की शर्तें
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि वे ईरान के साथ हालिया वार्ताओं से संतुष्ट नहीं थे और उन्होंने दोहराया कि ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। अमेरिका पहले से स्पष्ट कर चुका है कि वह हथियार-स्तर के यूरेनियम संवर्धन पर रोक, अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण की अनुमति और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पर सीमाएं चाहता है। ईरान इन आरोपों से इनकार करता रहा है और अपने परमाणु कार्यक्रम को शांतिपूर्ण बताता है।

ईरान और इजरायल में हालात
हमलों के तुरंत बाद ईरान ने अपना हवाई क्षेत्र बंद कर दिया। कई अंतरराष्ट्रीय उड़ानों ने अपने मार्ग बदल लिए। मोबाइल नेटवर्क और कुछ सरकारी वेबसाइटों के प्रभावित होने की खबरें भी सामने आई हैं, जिससे संकेत मिलता है कि साइबर युद्ध भी इस अभियान का हिस्सा हो सकता है। दूसरी ओर, इजरायल ने भी हाई अलर्ट घोषित कर अपना एयरस्पेस बंद किया है और संभावित जवाबी हमलों की तैयारी शुरू कर दी है।

क्या यह व्यापक युद्ध की शुरुआत है?
अब सबसे बड़ा और संवेदनशील प्रश्न यही है कि क्या मौजूदा घटनाक्रम एक बड़े युद्ध की ओर संकेत कर रहा है। हालात पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेंगे कि ईरान किस तरह की प्रतिक्रिया देता है। यदि ईरान सीधे और व्यापक सैन्य कार्रवाई करता है, तो यह टकराव सीमित हमलों से आगे बढ़कर पूरे क्षेत्र में फैल सकता है। ऐसी स्थिति में संघर्ष केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि मध्य पूर्व के अन्य देशों को भी अपनी चपेट में ले सकता है। इसके वैश्विक प्रभाव भी गंभीर हो सकते हैं। कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आ सकता है, जिससे विश्व अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ेगा। अंतरराष्ट्रीय शेयर बाजारों में अस्थिरता और निवेशकों की घबराहट देखने को मिल सकती है। क्षेत्र में बड़े पैमाने पर सैन्य तैनाती बढ़ सकती है और अमेरिका सहित उसके सहयोगी देशों की सीधी भागीदारी की संभावना भी मजबूत हो सकती है। आने वाले कुछ दिन यह तय करेंगे कि हालात सीमित सैन्य तनाव तक सिमटेंगे या व्यापक क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले लेंगे।
सूत्रों के अनुसार, यह ऑपरेशन एक-दो दिन की कार्रवाई तक सीमित नहीं रह सकता। आने वाले दिनों में और हमलों की संभावना जताई जा रही है। दिन के उजाले में किया गया हमला केवल एक सैन्य कदम नहीं, बल्कि एक रणनीतिक और राजनीतिक संदेश भी है कि इजरायल और अमेरिका अब ईरान की क्षमताओं को लेकर प्रतीक्षा की नीति छोड़ चुके हैं। पश्चिम एशिया एक बार फिर बड़े संकट के मुहाने पर खड़ा है। आने वाले 48 से 72 घंटे यह तय करेंगे कि यह संघर्ष सीमित सैन्य कार्रवाई तक रहेगा या व्यापक युद्ध का रूप ले लेगा।




