बंगाल में ‘पीपुल्स मेनिफेस्टो’ बनाम ‘वेलफेयर मॉडल’… चुनावी मुकाबले में BJP और TMC की रणनीति क्या संकेत दे रही है?

बंगाल में ‘पीपुल्स मेनिफेस्टो’ बनाम ‘वेलफेयर मॉडल’… चुनावी मुकाबले में BJP और TMC की रणनीति क्या संकेत दे रही है?

द फ्रंट डेस्क: पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले सियासी तापमान लगातार बढ़ रहा है। एक ओर भारतीय जनता पार्टी ने ‘पीपुल्स मेनिफेस्टो’ के नाम से नई रणनीति का ऐलान किया है, तो दूसरी ओर सत्तारूढ़ All India Trinamool Congress (टीएमसी) अपने मौजूदा कल्याणकारी मॉडल को ही चुनावी हथियार बना रही है। इस बार मुकाबला केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं दिख रहा, बल्कि ‘मॉडल बनाम मॉडल’ की सीधी टक्कर के रूप में उभरता नजर आ रहा है। चुनावी विमर्श अब इस बात पर केंद्रित होता जा रहा है कि जनता भागीदारी आधारित घोषणापत्र को तरजीह देगी या पहले से लागू कल्याणकारी योजनाओं को।

‘नीचे से ऊपर’ घोषणापत्र का दावा

बीजेपी का दावा है कि इस बार उसका घोषणापत्र नेतृत्व द्वारा तैयार पारंपरिक दस्तावेज नहीं होगा, बल्कि यह जनता की राय से तैयार किया जाएगा। पार्टी ने राज्यभर में सुझाव अभियान शुरू किया है, जिसके तहत गांव-गांव, शहर-शहर जाकर लोगों से उनकी समस्याएं, अपेक्षाएं और प्राथमिकताएं लिखित रूप में मांगी जा रही हैं। बीजेपी इसे जनभागीदारी का मॉडल बता रही है और कह रही है कि नीतियां “नीचे से ऊपर” तय होंगी। सूत्रों के मुताबिक, अब तक जो सुझाव सामने आए हैं, उनमें भ्रष्टाचार और कथित ‘कट मनी’ पर सख्त कार्रवाई, कानून-व्यवस्था की मजबूती, रोजगार सृजन, उद्योगों को बढ़ावा, युवाओं के पलायन पर रोक, सिंडिकेट संस्कृति का अंत और प्रत्यक्ष लाभांतरण योजनाओं में पारदर्शिता जैसे मुद्दे प्रमुख हैं। पार्टी यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि उसका संकल्प पत्र जनता की आवाज का प्रतिबिंब होगा, न कि केवल राजनीतिक घोषणाओं का दस्तावेज।

रीजनल रणनीति पर फोकस

बीजेपी की रणनीति में इस बार क्षेत्रीय संतुलन को विशेष महत्व दिया जा रहा है। उत्तर बंगाल के आठ जिलों—कूच बिहार, अलीपुरद्वार, जलपाईगुड़ी, दार्जिलिंग और आसपास के इलाकों के लिए अलग मिनी घोषणापत्र तैयार करने की चर्चा है। पार्टी का मानना है कि उत्तर बंगाल की सामाजिक-आर्थिक जरूरतें दक्षिण बंगाल से अलग हैं, इसलिए क्षेत्र-विशेष योजनाएं और वादे जरूरी हैं। सूत्रों के अनुसार, उत्तर बंगाल के लिए औद्योगिक निवेश, पर्यटन को बढ़ावा, उच्च शिक्षा संस्थानों की स्थापना, सड़क और कनेक्टिविटी सुधार, और युवाओं को आर्थिक सहायता जैसे प्रस्तावों पर विचार किया जा रहा है। इसके साथ ही हर साल बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन और क्षेत्रीय विकास परियोजनाओं को भी चुनावी एजेंडा बनाया जा सकता है। बीजेपी यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि उसकी रणनीति केवल राज्यव्यापी नहीं, बल्कि क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप भी है।

बीजेपी की ये रणनीति चुनावी जुमला है: TMC

दूसरी ओर टीएमसी इस पूरी पहल को चुनावी रणनीति से ज्यादा कुछ नहीं मानती। पार्टी का कहना है कि बीजेपी घोषणाओं की राजनीति कर रही है, जबकि राज्य सरकार पहले से ही जमीन पर योजनाएं लागू कर रही है। टीएमसी नेताओं का दावा है कि उनकी सरकार की ‘युवा साथी’ जैसी योजनाएं युवाओं को प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता दे रही हैं और इसका लाभ सीधे लाभार्थियों तक पहुंच रहा है। टीएमसी का यह भी कहना है कि उसका शासन मॉडल सामाजिक सुरक्षा, महिला सशक्तिकरण, छात्रवृत्ति, ग्रामीण विकास और प्रत्यक्ष लाभांतरण पर आधारित है। पार्टी बीजेपी पर आरोप लगाती है कि वह बड़े-बड़े वादे करती है, लेकिन उसके पास राज्य के लिए कोई स्पष्ट और व्यावहारिक रोडमैप नहीं है। टीएमसी की रणनीति यह दिखाने की है कि उसका मॉडल पहले से काम कर रहा है और उसे केवल निरंतरता की जरूरत है।

सुरक्षा, रोजगार और सीधी मदद पर फोकस

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस बार बंगाल में चुनावी बहस तीन प्रमुख मुद्दों के इर्द-गिर्द घूम सकती है—सुरक्षा, रोजगार और प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता। बीजेपी ‘पीपुल्स मेनिफेस्टो’ के जरिए यह संदेश दे रही है कि वह बदलाव, जवाबदेही और पारदर्शिता लाना चाहती है। वहीं टीएमसी अपने मौजूदा वेलफेयर मॉडल के आधार पर स्थिरता और भरोसे की राजनीति कर रही है। चुनाव से पहले की स्थिति यह संकेत देती है कि मुकाबला केवल राजनीतिक दलों के बीच नहीं, बल्कि दो अलग-अलग दृष्टिकोणों के बीच है। एक तरफ वह मॉडल है जो जनता की राय से नई नीतियां गढ़ने की बात करता है, और दूसरी तरफ वह मॉडल है जो लागू योजनाओं की निरंतरता और प्रत्यक्ष लाभ पर जोर देता है। अब अंतिम फैसला मतदाताओं के हाथ में है कि वे किस रणनीति और किस दृष्टिकोण को अधिक विश्वसनीय मानते हैं।

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