पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर जारी विवाद अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। रिविजन का काम तय समयसीमा में पूरा न होने पर सुप्रीम कोर्ट ने असाधारण कदम उठाते हुए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने विशेष अधिकारों का इस्तेमाल किया है। अदालत ने साफ संकेत दिया है कि यदि प्रक्रिया में और देरी हुई तो राज्य सरकार को इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।
न्यायिक अधिकारियों की तैनाती का आदेश
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने राज्य में न्यायिक अधिकारियों (Judicial Officers) की तैनाती का आदेश दिया है। ये अधिकारी मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने से जुड़े दावों और आपत्तियों का निपटारा करेंगे, ताकि प्रक्रिया तेजी से पूरी हो सके। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार और निर्वाचन आयोग के बीच भरोसे की कमी और सहयोग के अभाव के कारण असाधारण स्थिति पैदा हुई है, जिसके चलते उसे हस्तक्षेप करना पड़ा। पीठ ने निर्वाचन आयोग को 28 फरवरी तक संशोधित मतदाता सूची का 95 प्रतिशत हिस्सा प्रकाशित करने की अनुमति दी है। बाकी बचे दावों का निपटारा न्यायिक अधिकारियों की मदद से बाद में किया जाएगा।

अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल क्यों?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 142 के तहत उसे पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए व्यापक अधिकार प्राप्त हैं। अदालत ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों द्वारा दिए गए आदेशों को शीर्ष अदालत के आदेश के समान माना जाएगा और पुलिस अधीक्षक व जिला प्रशासन को उनका तुरंत पालन करना होगा। कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को निर्देश दिया गया है कि वे सेवा में कार्यरत न्यायिक अधिकारियों और अच्छी छवि वाले सेवानिवृत्त जिला एवं अतिरिक्त जिला जजों का चयन करें। ये अधिकारी तथाकथित ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ श्रेणी में आने वाले मतदाताओं के दावों और दस्तावेजों की जांच करेंगे।

राज्य सरकार बनाम चुनाव आयोग
सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग और राज्य सरकार के बीच तीखी बहस देखने को मिली। आयोग ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने आवश्यक अधिकारियों की तैनाती नहीं की और प्रक्रिया में सहयोग नहीं दिया। वहीं, राज्य सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। हालांकि, अदालत ने उनकी आपत्तियों को खारिज कर दिया और पुनरीक्षण प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का आदेश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य पुलिस की भूमिका पर भी गंभीर चिंता जताई। अदालत ने राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है, जिसमें बताया जाए कि निर्वाचन आयोग की शिकायतों और पुनरीक्षण प्रक्रिया में बाधा डालने वाली घटनाओं पर क्या कार्रवाई की गई। पीठ ने कहा कि राज्य सरकार और आयोग के बीच आरोप-प्रत्यारोप ने पूरी प्रक्रिया को प्रभावित किया है, जिससे न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा।

आगे की सुनवाई
न्यायिक अधिकारियों की तैनाती से कुछ समय के लिए अदालतों के नियमित कामकाज पर असर पड़ सकता है। इसे देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट से आवश्यक मामलों को अन्य अदालतों में स्थानांतरित करने की व्यवस्था करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई मार्च के पहले सप्ताह में होगी। तब तक यह देखना अहम होगा कि संशोधित मतदाता सूची का प्रकाशन तय समयसीमा में हो पाता है या नहीं। बंगाल का SIR विवाद अब केवल प्रशासनिक मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह संवैधानिक अधिकारों और संस्थाओं के बीच संतुलन की बड़ी परीक्षा बन चुका है।




