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Republic Day 2026: आजादी से पहले कैसा था हमारा झंडा, कैसे बदलता गया उसका रूप

Republic Day 2026: आजादी से पहले कैसा था हमारा झंडा, कैसे बदलता गया उसका रूप

Republic Day 2026 के मौके पर जब तिरंगा हर घर, हर सड़क और हर समारोह में लहराता है, तो मन में स्वाभाविक रूप से गर्व का भाव उमड़ पड़ता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि आज जो तिरंगा हम देखते हैं, वह एक ही दिन में नहीं बना। आज का राष्ट्रीय ध्वज कई आंदोलनों, विचारधाराओं और ऐतिहासिक मोड़ों से गुजरकर इस रूप तक पहुंचा है। यह सिर्फ कपड़े के तीन रंगों का मेल नहीं, बल्कि भारत की आजादी की पूरी यात्रा का जीवंत प्रतीक है।

राष्ट्रीय ध्वज: सिर्फ झंडा नहीं, एक पहचान

भारत का राष्ट्रीय ध्वज देश की आत्मा और सामूहिक चेतना का प्रतीक है। यह साहस, शांति, एकता और उम्मीद का संदेश देता है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यही ध्वज लोगों के हाथों में शक्ति बनकर लहराया और उन्हें संघर्ष के लिए प्रेरित करता रहा। जब देश आजाद हुआ, तो इसी ध्वज ने नवगठित राष्ट्र की पहचान तय की। लेकिन इस पहचान तक पहुंचने का सफर आसान नहीं था—यह वर्षों के संघर्ष और अनगिनत बलिदानों की कहानी है।

आज का तिरंगा कैसा दिखता है

वर्तमान भारतीय राष्ट्रीय ध्वज तीन समान क्षैतिज पट्टियों से बना है। सबसे ऊपर केसरिया रंग, बीच में सफेद और नीचे हरा रंग होता है। झंडे की लंबाई और चौड़ाई का अनुपात 3:2 निर्धारित है। सफेद पट्टी के मध्य में गहरे नीले रंग का अशोक चक्र अंकित है, जिसमें 24 तीलियां होती हैं। यह चक्र सारनाथ स्थित सम्राट अशोक के स्तंभ से लिया गया है और कानून, गति तथा संतुलन का प्रतीक माना जाता है।

मौजूदा झंडा कब अपनाया गया

भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को उसके वर्तमान स्वरूप में 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने स्वीकार किया था। यह फैसला आजादी से कुछ सप्ताह पहले लिया गया था। 15 अगस्त 1947 से लेकर 26 जनवरी 1950 तक यह ध्वज भारत की पहचान बना रहा और गणराज्य बनने के बाद भी यही झंडा राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में कायम रहा।

आजादी से पहले झंडे के कई रूप

राष्ट्रीय ध्वज का विकास कई चरणों में हुआ। आजादी से पहले अलग-अलग दौर में कई झंडे सामने आए, जो उस समय की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों को दर्शाते थे। माना जाता है कि करीब पांच प्रमुख झंडों के बाद मौजूदा तिरंगे का स्वरूप तय हुआ।

1906: पहली सार्वजनिक झलक

7 अगस्त 1906 को कोलकाता के पारसी बागान चौक पर पहली बार एक झंडा फहराया गया, जिसे भारत का पहला राष्ट्रीय झंडा माना जाता है। इसमें ऊपर हरा, बीच में पीला और नीचे लाल रंग की पट्टियां थीं। झंडे पर कमल के फूल और चांद-सूरज के प्रतीक बने थे। यह स्वतंत्रता की आकांक्षा की पहली सार्वजनिक अभिव्यक्ति थी।

विदेशों में आजादी का संदेश

1907 में पेरिस में निर्वासित भारतीय क्रांतिकारियों के साथ भीकाजी कामा ने एक झंडा फहराया। यह पहले झंडे जैसा था, लेकिन इसमें सात तारे जोड़े गए थे, जिन्हें सप्तऋषि का प्रतीक माना गया। बाद में यह झंडा बर्लिन में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भी प्रदर्शित किया गया, जिससे दुनिया तक भारत की आजादी की मांग पहुंची।

1917 और होम रूल आंदोलन

1917 में स्वतंत्रता आंदोलन के नए चरण में एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने होम रूल आंदोलन के दौरान एक नया झंडा पेश किया। इसमें लाल और हरी पट्टियां थीं, सात सितारे बनाए गए थे और एक कोने में यूनियन जैक भी शामिल था। यह झंडा उस दौर के राजनीतिक समझौतों और संघर्षों का प्रतीक था।

1921: गांधी जी का सुझाव

1921 में विजयवाड़ा में कांग्रेस अधिवेशन के दौरान एक युवक ने एक झंडा बनाकर महात्मा गांधी को सौंपा। इसमें लाल और हरे रंग थे, जिन्हें हिंदू और मुस्लिम समुदाय का प्रतीक माना गया। गांधी जी ने इसमें अन्य समुदायों के लिए सफेद रंग जोड़ने और आत्मनिर्भरता के प्रतीक के रूप में चरखा शामिल करने का सुझाव दिया। यहीं से तिरंगे की नींव मजबूत हुई।

1931: तिरंगे को मिली पहचान

1931 का वर्ष भारतीय ध्वज इतिहास में निर्णायक माना जाता है। इसी साल तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाने का प्रस्ताव पारित हुआ। इसके केंद्र में चरखा था। यह झंडा कांग्रेस का प्रतीक बना और स्वतंत्रता संग्राम के दौरान व्यापक रूप से इस्तेमाल हुआ।

चरखे से अशोक चक्र तक

आजादी के बाद राष्ट्रीय ध्वज में एक महत्वपूर्ण बदलाव किया गया। चरखे की जगह अशोक चक्र को शामिल किया गया, ताकि झंडा किसी एक राजनीतिक दल से नहीं, बल्कि पूरे देश की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक बने। इसी बदलाव के साथ स्वतंत्र भारत का तिरंगा अपने मौजूदा रूप में सामने आया।

आज जब Republic Day 2026 पर तिरंगा लहराता है, तो वह सिर्फ आजादी का प्रतीक नहीं रहता, बल्कि उस लंबे संघर्ष, विचार और बलिदान की याद दिलाता है, जिसने भारत को एक संप्रभु गणराज्य बनाया।

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