माइकल मधुसूदन दत्त भारतीय साहित्य के उन विरल रचनाकारों में हैं, जिनका जीवन और लेखन दोनों ही विद्रोह की गहरी छाप लिए हुए हैं। 25 जनवरी 1824 को जन्मे मधुसूदन दत्त केवल एक कवि या नाटककार नहीं थे, बल्कि वे उस संक्रमणकाल के प्रतिनिधि थे, जब भारतीय साहित्य परंपरा और आधुनिकता के बीच अपने रास्ते तलाश रहा था। आज उनकी जयंती के अवसर पर जब हम उन्हें स्मरण करते हैं, तो यह स्मरण केवल एक साहित्यकार का नहीं, बल्कि उस चेतना का है, जिसने भारतीय साहित्य को प्रश्न करना सिखाया। उन्होंने अपने समय की रूढ़ मान्यताओं, धार्मिक जड़ताओं और साहित्यिक सीमाओं को प्रश्नांकित किया और उसी प्रश्नाकुलता से एक नए साहित्यिक युग का सूत्रपात हुआ।
मधुसूदन दत्त का व्यक्तित्व अपने आप में एक टकराव था—पूर्व और पश्चिम के बीच, आस्था और तर्क के बीच, परंपरा और प्रयोग के बीच। उच्च शिक्षित होने के कारण वे पश्चिमी साहित्य से गहराई से प्रभावित थे, लेकिन उनकी रचनात्मक आत्मा अंततः अपनी भाषा और अपनी सांस्कृतिक मिट्टी की ओर लौट आती है। यही द्वंद्व उनकी रचनाओं को असाधारण बनाता है। उन्होंने रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों को श्रद्धा से नहीं, दृष्टि से पढ़ा—और वही दृष्टि उन्हें अपने समकालीन लेखकों से अलग करती है।
उनकी अमर कृति मेघनाद वध काव्य बंगाली साहित्य के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ मानी जाती है। इसमें उन्होंने परंपरागत नायक-खलनायक की अवधारणा को तोड़ते हुए मेघनाद जैसे पात्र को करुणा और गरिमा के साथ प्रस्तुत किया। यह केवल काव्यात्मक प्रयोग नहीं था, बल्कि यह उस सामाजिक-सांस्कृतिक सोच को चुनौती थी, जो साहित्य को केवल धर्म और नैतिकता का विस्तार मानती थी। मधुसूदन दत्त ने यह सिद्ध किया कि साहित्य का काम प्रश्न करना है, न कि केवल स्थापित सत्य को दोहराना।
भाषा और शिल्प के स्तर पर भी उन्होंने क्रांतिकारी प्रयोग किए। बंगाली कविता में अमित्राक्षर छंद का प्रयोग कर उन्होंने काव्य को नई लय और नई स्वतंत्रता दी। उनकी भाषा में संस्कृत की गंभीरता, फारसी की कोमलता और पश्चिमी काव्य की आधुनिक चेतना एक साथ मिलती है। यही कारण है कि उन्हें बंगाली साहित्य का पहला आधुनिक कवि कहा जाता है।
विडंबना यह है कि जिसने साहित्य को इतनी समृद्धि दी, उसका निजी जीवन अभावों, संघर्षों और उपेक्षा से भरा रहा। जीवन के अंतिम वर्षों में वे आर्थिक तंगी और मानसिक पीड़ा से जूझते रहे, लेकिन उनकी लेखनी की धार कभी कुंद नहीं हुई। यह त्रासदी नहीं, बल्कि उस दौर के समाज का आईना है, जो अपने सृजनशील व्यक्तियों को समय रहते पहचान नहीं सका।
आज, उनकी जयंती पर, माइकल मधुसूदन दत्त को याद करना केवल अतीत में लौटना नहीं है। यह उस साहित्यिक साहस को प्रणाम करना है, जिसने परंपरा से टकराने का जोखिम उठाया और आधुनिकता का मार्ग खोला। वे आज भी हमारे समय से संवाद करते हैं—हमें याद दिलाते हुए कि साहित्य का असली धर्म है निर्भीकता। जयंती के इस दिन उनका स्मरण इस विश्वास के साथ किया जाना चाहिए कि जब तक साहित्य प्रश्न करता रहेगा, माइकल मधुसूदन दत्त जीवित रहेंगे।




