वह कलम, जिसने समाज की चुप पीड़ा को आवाज़ दी

वह कलम, जिसने समाज की चुप पीड़ा को आवाज़ दी

आज शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय की पुण्यतिथि है। यह दिन किसी औपचारिक स्मरण से अधिक उस संवेदना को याद करने का अवसर है, जिसने भारतीय साहित्य को मनुष्य के सबसे कोमल और सबसे पीड़ित पक्ष से जोड़ दिया। शरतचन्द्र केवल लेखक नहीं थे, वे अपने समय की सामाजिक बेचैनी, टूटते रिश्तों और दबाई गई भावनाओं की आवाज़ थे। उन्होंने साहित्य को सजावट नहीं, सच्चाई दी—ऐसी सच्चाई, जो कई बार असहज करती है, लेकिन नज़रें फेरने नहीं देती।

शरतचन्द्र का जीवन संघर्षों से भरा रहा। गरीबी, पारिवारिक अस्थिरता और समाज की कठोरता उन्होंने बहुत करीब से देखी। शायद यही कारण था कि उनका लेखन कल्पना से अधिक अनुभव की ज़मीन पर खड़ा दिखाई देता है। वे जिन पात्रों को रचते हैं, वे किसी आदर्श दुनिया से नहीं आते, बल्कि उसी समाज से निकलते हैं, जिसमें इंसान हर दिन समझौते करता है, टूटता है और फिर भी जीने की कोशिश करता है। उनके लिए साहित्य मनोरंजन नहीं था, बल्कि समाज से संवाद का माध्यम था।

उनकी रचनाओं में प्रेम है, लेकिन वह प्रेम कभी सरल नहीं होता। उसमें वर्ग, मर्यादा, आर्थिक असमानता और सामाजिक पाखंड की दीवारें खड़ी रहती हैं। शरतचन्द्र का प्रेम आदर्श नहीं, यथार्थ है—जहाँ चाहत के साथ पीड़ा भी चलती है। उनके पात्र अक्सर हारते हैं, लेकिन उनकी हार में भी एक गहरी मानवीय सच्चाई होती है, जो पाठक को भीतर तक छू जाती है।

शरतचन्द्र के साहित्य की सबसे बड़ी ताकत उनकी स्त्री पात्र हैं। उन्होंने स्त्री को सहानुभूति का पात्र नहीं, बल्कि आत्मसम्मान से भरा इंसान माना। उनकी स्त्रियाँ चुपचाप सब सहने वाली नहीं हैं; वे सवाल करती हैं, निर्णय लेती हैं और कई बार समाज के बनाए नियमों से टकराती हैं। उस दौर में, जब स्त्री को नैतिकता के कठोर दायरे में बाँध दिया गया था, शरतचन्द्र ने उसे संवेदनशीलता और स्वतंत्रता दोनों दीं। यही कारण है कि उनकी स्त्री पात्र आज भी उतनी ही जीवंत और प्रासंगिक लगती हैं।

शरतचन्द्र को उनके समय में आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा। उन पर समाज की नैतिकता को चुनौती देने, परंपराओं को तोड़ने और भावनाओं को खुलकर रखने के आरोप लगे। लेकिन आम पाठक ने उन्हें अपनाया, क्योंकि उनके शब्दों में बनावट नहीं थी। वे वह लिखते थे, जो लोग महसूस तो करते थे, लेकिन कह नहीं पाते थे। यही ईमानदारी उन्हें जनता के दिलों तक ले गई।

उनकी रचनाएँ साहित्य की सीमाओं को पार कर सिनेमा और रंगमंच तक पहुँचीं। ‘देवदास’ जैसी कृति बार-बार नए रूप में सामने आई, लेकिन उसकी आत्मा वही रही—अधूरा प्रेम, असफल इंसान और समाज के सामने असहाय भावनाएँ। यह इस बात का प्रमाण है कि शरतचन्द्र का लेखन समय और माध्यम से ऊपर उठकर मनुष्य की स्थायी पीड़ा को छूता है।

आज, जब समाज फिर से रिश्तों, स्त्री की स्वतंत्रता, प्रेम और नैतिकता के सवालों से जूझ रहा है, शरतचन्द्र और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। वे हमें यह याद दिलाते हैं कि साहित्य का काम उपदेश देना नहीं, बल्कि मनुष्य को समझना है। उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना दरअसल उस संवेदना को जीवित रखना है, जो इंसान को इंसान बनाए रखती है। शरतचन्द्र भले हमारे बीच न हों, लेकिन उनकी क

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