मध्य पूर्व एक बार फिर ऐसे निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया था, जहां लिया गया एक छोटा सा फैसला पूरे इलाके को युद्ध की आग में झोंक सकता था। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने न केवल खाड़ी देशों की चिंता बढ़ा दी थी, बल्कि वैश्विक ताकतों को भी अलर्ट मोड में ला दिया था। हालात इस कदर नाज़ुक हो चुके थे कि सैन्य कार्रवाई अब सिर्फ बयानबाज़ी तक सीमित नहीं रही, बल्कि ज़मीनी स्तर पर तैयारियों के संकेत भी मिलने लगे थे।
इसी नाज़ुक समय में सऊदी अरब, कतर और ओमान ने वह भूमिका निभाई, जिसे कूटनीतिक भाषा में बैक-चैनल डिप्लोमेसी कहा जाता है। पर्दे के पीछे की गई यही कोशिशें आखिरकार ईरान पर संभावित अमेरिकी हमले को टालने में निर्णायक साबित हुईं।
संकट की पृष्ठभूमि: तनाव यहां तक क्यों पहुंचा?
ईरान में जारी विरोध प्रदर्शनों और उन पर कथित सख्त कार्रवाई को लेकर अमेरिका पहले से ही नाराज़ था। वॉशिंगटन से संकेत मिलने लगे थे कि अगर हालात में बदलाव नहीं हुआ, तो सैन्य विकल्प पर भी विचार किया जा सकता है। इसके जवाब में तेहरान ने भी आक्रामक रुख अपनाते हुए साफ कहा कि यदि उस पर हमला हुआ, तो खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकाने और युद्धपोत सीधे निशाने पर होंगे।
तनाव की गंभीरता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिका को कतर स्थित अल-उदेद एयरबेस—जो मध्य पूर्व में उसका सबसे बड़ा सैन्य अड्डा माना जाता है—से अपने कुछ सैन्य कर्मियों को अस्थायी रूप से हटाना पड़ा। इसके साथ ही पूरे खाड़ी क्षेत्र में सुरक्षा एजेंसियां हाई अलर्ट पर आ गईं और सैन्य गतिविधियों में बदलाव किए गए।
बैक-चैनल डिप्लोमेसी: जब पर्दे के पीछे तय होते हैं बड़े फैसले
बैक-चैनल डिप्लोमेसी वह प्रक्रिया होती है, जिसमें देश सार्वजनिक मंचों और मीडिया से दूर रहकर गोपनीय स्तर पर संवाद करते हैं, ताकि बयानबाज़ी के दबाव से बचते हुए समाधान निकाला जा सके। इस संकट में भी यही तरीका अपनाया गया—और यही वजह बनी कि युद्ध टल सका।
सऊदी अरब, कतर और ओमान क्यों बने मध्यस्थ?
इन तीनों देशों की खासियत यह रही कि:
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अमेरिका के साथ इनके रणनीतिक और सैन्य रिश्ते मजबूत हैं
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वहीं ईरान के साथ भी इनके राजनयिक चैनल खुले हुए हैं
हालात बिगड़ते ही इन देशों ने सक्रियता दिखाई। सऊदी अरब ने अमेरिकी नेतृत्व को स्पष्ट किया कि ईरान पर हमला पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर सकता है और इसका असर तेल आपूर्ति, वैश्विक अर्थव्यवस्था और सुरक्षा संतुलन पर पड़ेगा। कतर ने अमेरिका और ईरान—दोनों से संवाद की स्थिति में रहते हुए संदेशवाहक की भूमिका निभाई, जबकि ओमान ने अपनी पारंपरिक शांत कूटनीति के जरिए तनाव कम करने वाले संकेत दोनों पक्षों तक पहुंचाए।
ट्रंप को कैसे मनाया गया?
खाड़ी देशों ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से लगातार संपर्क बनाए रखा। उन्हें समझाया गया कि ईरान को अपनी स्थिति स्पष्ट करने का एक मौका दिया जाना चाहिए, क्योंकि सैन्य कार्रवाई से हालात नियंत्रण से बाहर जा सकते हैं और एक बार संघर्ष शुरू होने के बाद उसे सीमित रखना मुश्किल होगा। खाड़ी अधिकारियों के मुताबिक, यह आखिरी पलों की कूटनीतिक जद्दोजहद थी, जिसमें फोन कॉल, विशेष दूत और गोपनीय संदेश अहम भूमिका में रहे।
ईरान को भी दिया गया कड़ा संदेश
बैक-चैनल डिप्लोमेसी का दूसरा पहलू यह रहा कि खाड़ी देशों ने ईरान से भी साफ बातचीत की। उसे चेतावनी दी गई कि यदि उसने खाड़ी में अमेरिकी ठिकानों पर हमला किया, तो क्षेत्रीय देशों के साथ उसके रिश्ते लंबे समय तक खराब हो सकते हैं। यह संदेश इसलिए भी अहम था, क्योंकि खाड़ी देशों के साथ व्यापार, ऊर्जा और सुरक्षा सहयोग ईरान के लिए रणनीतिक महत्व रखता है।
भरोसे की डील: अमेरिका को क्या मिला?
लगातार बातचीत के बाद अमेरिका को यह भरोसा दिलाया गया कि ईरान हालात को और भड़काने वाला कोई कदम नहीं उठाएगा और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अत्यधिक कठोर कार्रवाई से बचेगा। इसके बाद अमेरिकी प्रशासन ने फिलहाल सैन्य विकल्प को टालने का फैसला किया। अल-उदेद एयरबेस पर सुरक्षा स्तर घटाया गया और अमेरिकी सैन्य गतिविधियां धीरे-धीरे सामान्य स्थिति की ओर लौटने लगीं।
ट्रंप के बदले सुर
सख्त चेतावनियों के दौर के बाद राष्ट्रपति ट्रंप के बयानों में नरमी दिखाई दी। उन्होंने कहा कि उन्हें “दूसरी तरफ के बेहद अहम सूत्रों” से भरोसा मिला है कि ईरान कोई उकसाने वाला कदम नहीं उठाएगा। इसी भरोसे के आधार पर तत्काल सैन्य कार्रवाई टाल दी गई।
इस पूरे घटनाक्रम का बड़ा संदेश
यह संकट दिखाता है कि मध्य पूर्व में अब क्षेत्रीय ताकतें निर्णायक भूमिका निभा रही हैं। केवल सैन्य शक्ति ही नहीं, बल्कि संवाद, संयम और समय पर की गई कूटनीति भी बड़े टकराव को रोक सकती है। सऊदी अरब, कतर और ओमान की भूमिका ने साबित कर दिया कि अगर वक्त रहते कूटनीति सक्रिय हो जाए, तो युद्ध जैसे विकल्प को भी रोका जा सकता है।




