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ईरान के जिस राजा ने दिल्ली को कर दिया था लहूलुहान, कौन था वह शासक और क्या-क्या लूट ले गया? जानिए पूरी कहानी

ईरान के जिस राजा ने दिल्ली को कर दिया था लहूलुहान, कौन था वह शासक और क्या-क्या लूट ले गया? जानिए पूरी कहानी

आज का ईरान भले ही एक अलग राजनीतिक और सामाजिक दौर से गुजर रहा हो, लेकिन इतिहास के पन्नों में उसका नाम हिंदुस्तान की एक ऐसी त्रासदी से जुड़ा है, जिसे आज भी दिल्ली का सबसे काला अध्याय माना जाता है।
करीब 300 साल पहले, ईरान के एक राजा ने दिल्ली पर हमला कर ऐसा कत्लेआम मचाया था, जिसने मुगल सल्तनत की रीढ़ तोड़ दी। यह हमला न सिर्फ खून-खराबे के लिए याद किया जाता है, बल्कि इसलिए भी कि इसने भारत की सदियों की जमा दौलत को एक झटके में लुटा दिया।

जब दुनिया की सबसे अमीर सल्तनत थी दिल्ली

मुगल काल में दिल्ली दुनिया के सबसे अमीर शहरों में गिनी जाती थी। सोना-चांदी, हीरे-जवाहरात और शाही खजाने की चर्चा दूर-दूर तक थी।
लेकिन औरंगज़ेब की मौत के बाद मुगल साम्राज्य कमजोर होने लगा। दरबार में गुटबाजी, कमजोर बादशाह और ऐशो-आराम में डूबा शासन—इन सबने सल्तनत को भीतर से खोखला कर दिया।

यही कमजोरी विदेशी आक्रमणकारियों के लिए न्योता बन गई।

कौन था वह ईरानी राजा?

उस शासक का नाम था नादिरशाह—ईरान का ताकतवर, क्रूर और बेहद महत्वाकांक्षी राजा।
जब उसे दिल्ली की दौलत और कमजोर मुगल सत्ता की खबर मिली, तो उसने हिंदुस्तान पर चढ़ाई का फैसला कर लिया।

साल 1738 में नादिरशाह अपनी सेना के साथ खैबर दर्रा पार करता हुआ भारत की ओर बढ़ा। उस वक्त दिल्ली की गद्दी पर बैठा था मुगल बादशाह मोहम्मद शाह रंगीला, जिसे इतिहास एक विलासी और कमजोर शासक के रूप में याद करता है।

करनाल की लड़ाई: जहां मुगल ताकत ढह गई

दिल्ली पहुंचने से पहले 1739 में करनाल के मैदान में नादिरशाह और मुगल सेना आमने-सामने हुई।
मुगल सेना संख्या में कई गुना ज्यादा थी—अवध और दक्कन की सेनाएं भी साथ थीं, लेकिन नेतृत्व बिखरा हुआ और रणनीति कमजोर थी।

नतीजा यह हुआ कि कम सैनिकों के बावजूद नादिरशाह ने मुगल सेना को करारी शिकस्त दी।
यह हार दुनिया को बता गई कि मुगल सल्तनत अब सिर्फ नाम की रह गई है।

बादशाह बना कैदी, दिल्ली में एंट्री

करनाल की जीत के बाद नादिरशाह ने समझौते का नाटक किया। उसने मुगल बादशाह मोहम्मद शाह को बातचीत के बहाने अपने शिविर में बुलाया और वहीं बंदी बना लिया।
फिर नादिरशाह, मुगल बादशाह को साथ लेकर दिल्ली में दाखिल हुआ।

शुरुआत में शहर में शांति रही, लेकिन हजारों ईरानी सैनिकों की मौजूदगी से हालात जल्द बिगड़ने लगे। महंगाई बढ़ी, राशन की कमी हुई और गुस्सा सड़कों पर उतर आया।

एक अफवाह और फिर दिल्ली का कत्लेआम

एक दिन अफवाह फैल गई कि नादिरशाह मारा गया है। गुस्साई भीड़ ने ईरानी सैनिकों पर हमला कर दिया।
जब नादिरशाह को यह खबर मिली, तो उसने दिल्ली में खुलेआम कत्लेआम का आदेश दे दिया।

22 मार्च 1739—दिल्ली के इतिहास का सबसे भयावह दिन।
चांदनी चौक, दरीबा, जामा मस्जिद और आसपास की गलियों में हजारों लोग मार दिए गए।
घरों में घुसकर हत्याएं हुईं, बाजार उजड़ गए और पूरी दिल्ली लाशों से पट गई।

जान के बदले दौलत

कत्लेआम रुकवाने के लिए मुगल दरबार के अफसरों ने नादिरशाह के सामने गिड़गिड़ाना शुरू किया।
आखिरकार नादिरशाह इस शर्त पर माना कि उसे अथाह दौलत दी जाए।

इसके बाद जो लूट हुई, उसने इतिहास बदल दिया—

  • बेहिसाब सोना और चांदी

  • हीरे-जवाहरात

  • मुगल सल्तनत की शान तख्त-ए-ताऊस (Peacock Throne)

  • कोहिनूर हीरा

  • तैमूरिया माणिक

इतिहासकार मानते हैं कि नादिरशाह इतनी दौलत ले गया कि ईरान में तीन साल तक टैक्स नहीं लिया गया।

एक हमले ने बदल दिया हिंदुस्तान का भविष्य

नादिरशाह के लौटने के बाद दिल्ली कभी पहले जैसी नहीं रह पाई।
सदियों में जमा की गई दौलत खत्म हो चुकी थी, सेना का मनोबल टूट चुका था और मुगल सल्तनत तेजी से पतन की ओर बढ़ने लगी।

इतिहासकार मानते हैं कि नादिरशाह का यह हमला—

  • मुगल साम्राज्य के अंत की शुरुआत था

  • और आगे चलकर भारत को दूसरे विदेशी आक्रमणों के लिए और कमजोर बना गया

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