शमशेर बहादुर सिंह जयंती: जब कविता शोर नहीं, अनुभूति बनती है

शमशेर बहादुर सिंह जयंती: जब कविता शोर नहीं, अनुभूति बनती है

आज हिंदी कविता के उस स्वर को याद करने का दिन है, जो ऊँची आवाज़ में नहीं बोलता, लेकिन बहुत दूर तक सुनाई देता है। शमशेर बहादुर सिंह की जयंती हमें उस कविता की ओर लौटने का अवसर देती है, जो शब्दों से अधिक अनुभूति पर भरोसा करती है। वे कवि थे, जिनकी पंक्तियाँ पढ़ते हुए लगता है मानो कोई दृश्य, कोई स्मृति, कोई भाव धीरे-धीरे हमारे भीतर आकार ले रहा हो।

13 जनवरी 1911 को जन्मे शमशेर बहादुर सिंह ने हिंदी कविता को एक ऐसी संवेदनशील भाषा दी, जिसमें सौंदर्य और सच्चाई साथ-साथ चलते हैं। वे नयी कविता आंदोलन के महत्वपूर्ण स्तंभ रहे, लेकिन उन्होंने कभी कविता को आंदोलन की सीमाओं में नहीं बाँधा। उनकी कविता मनुष्य के भीतर की दुनिया को, उसके प्रेम, अकेलेपन और पीड़ा को बेहद संयत और गहरे ढंग से व्यक्त करती है।

शमशेर की कविताओं में न तो शोर है और न ही दिखावा। वहाँ शब्द कम हैं, लेकिन अर्थ व्यापक हैं। उनकी पंक्तियाँ ठहरकर पढ़े जाने की माँग करती हैं। वे पाठक को बाँधती नहीं, बल्कि उसके भीतर उतर जाती हैं। शायद इसी कारण उन्हें “कवियों का कवि” कहा गया—एक ऐसा कवि, जिसे सबसे अधिक कवियों ने ही समझा और सराहा।

उनकी रचनाओं में सौंदर्य किसी सजावटी तत्व की तरह नहीं आता, बल्कि जीवन की सहज सच्चाई बनकर उपस्थित होता है। उनकी कविता चित्र की तरह उभरती है—हल्के रंगों और कोमल रेखाओं के साथ। ‘कुछ कविताएँ’, ‘कुछ और कविताएँ’, ‘चर्चा’ और ‘टूटे हुए पत्थर’ जैसे संग्रह उनकी इसी काव्य-दृष्टि के सशक्त उदाहरण हैं।

शमशेर बहादुर सिंह का जीवन भी उनकी कविता की तरह सादा और शांत रहा। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार जैसे सम्मान मिले, लेकिन वे हमेशा प्रचार और प्रदर्शन से दूर रहे। 12 मई 1993 को वे हमारे बीच नहीं रहे, पर उनकी कविता आज भी जीवित है—उसी संवेदनशीलता और गहराई के साथ।

शमशेर की जयंती केवल एक कवि का जन्मदिन नहीं है, बल्कि उस कविता को याद करने का दिन है, जो हमें तेज़ होते समय में ठहरना सिखाती है। उनकी कविता आज भी यह एहसास कराती है कि शब्द अगर सच्चे हों, तो वे धीमे होकर भी बहुत कुछ कह सकते हैं।

Share post:

Popular

More like this
Related