Iran Protests: तुर्कों और मंगोलों से लेकर इस्लामिक क्रांति तक, ईरान ने कितने युद्ध लड़े और कहां जीता–हारा?

Iran Protests: तुर्कों और मंगोलों से लेकर इस्लामिक क्रांति तक, ईरान ने कितने युद्ध लड़े और कहां जीता–हारा?

ईरान में एक बार फिर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं। इंटरनेट बंदी, राजनीतिक अस्थिरता और निर्वासित क्राउन प्रिंस रजा पहलवी की अपीलों के बीच हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं। ऐसे समय में ईरान के इतिहास पर नजर डालना जरूरी हो जाता है—एक ऐसा देश जिसने सदियों में कई बड़े युद्ध देखे हैं, जिनमें कहीं उसे जीत मिली तो कहीं भारी नुकसान उठाना पड़ा।

मध्यकालीन ईरान: तुर्क और मंगोल आक्रमण

11वीं से 15वीं शताब्दी के बीच ईरान ने अपने इतिहास के सबसे विनाशकारी दौर देखे। 11वीं और 12वीं शताब्दी में हुए सेल्जुक तुर्क आक्रमणों में ईरानी राजवंशों को राजनीतिक रूप से हार का सामना करना पड़ा और फारस पर तुर्कों का नियंत्रण स्थापित हो गया। हालांकि सत्ता हाथ से निकल गई, लेकिन फारसी संस्कृति और प्रशासनिक प्रभाव बना रहा और धीरे-धीरे तुर्की शासन पर भी हावी हो गया।

इसके बाद 13वीं शताब्दी में मंगोल आक्रमण ईरान के लिए सबसे भयावह साबित हुए। 1219 से 1258 के बीच चंगेज खान और बाद में हलाकू खान ने ख्वारज्मियन साम्राज्य को खत्म कर दिया। निशापुर, मर्व और बगदाद जैसे शहर तबाह हो गए, लाखों लोग मारे गए और सिंचाई प्रणालियां पूरी तरह नष्ट हो गईं। इसके बाद 14वीं शताब्दी में तैमूर के हमलों ने ईरान की तबाही को और गहरा कर दिया।

सफवी राजवंश और ऑटोमन संघर्ष

16वीं शताब्दी में सफवी राजवंश के उदय ने ईरान को फिर से संगठित किया और शिया इस्लाम को राज्य धर्म घोषित किया। इससे सुन्नी ऑटोमन साम्राज्य के साथ लंबे संघर्ष की शुरुआत हुई। 1514 में ऑटोमन सेना ने आधुनिक बारूद हथियारों के बल पर ईरान को हराया और उसे पूर्वी अनातोलिया गंवानी पड़ी।

हालांकि 17वीं शताब्दी में शाह अब्बास प्रथम के शासनकाल में ईरान ने अपनी सेना का आधुनिकीकरण किया और ऑटोमन साम्राज्य के खिलाफ पलटवार किया। तबरीज, जॉर्जिया, आर्मेनिया और बाद में बगदाद पर ईरान ने फिर से नियंत्रण हासिल किया। 1639 में जुहाब की संधि के साथ यह संघर्ष खत्म हुआ, जिसमें ईरान ने काकेशस अपने पास रखा, लेकिन मेसोपोटामिया हमेशा के लिए खो दिया।

19वीं सदी: रूस और ब्रिटेन से हार

कजार शासन के दौरान ईरान सैन्य और राजनीतिक रूप से कमजोर हो गया। 19वीं सदी में रूस के साथ दो बड़े युद्धों (1804–1813 और 1826–1828) में ईरान को करारी हार झेलनी पड़ी। गुलिस्तान और तुर्कमेनचाय की संधियों के तहत ईरान ने आर्मेनिया, अजरबैजान और दागिस्तान जैसे क्षेत्र रूस को सौंप दिए।

इसके अलावा 1856–57 के एंग्लो-फारसी युद्ध में ब्रिटेन ने ईरान को हरा दिया और उसे हेरात पर अपना दावा छोड़ना पड़ा। इस दौर में ईरान की संप्रभुता पर विदेशी शक्तियों का प्रभाव काफी बढ़ गया।

द्वितीय विश्व युद्ध में ईरान

1941 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन और सोवियत संघ ने संयुक्त रूप से ईरान पर हमला किया। मकसद तेल आपूर्ति और सैन्य आपूर्ति मार्गों को सुरक्षित करना था। ईरानी सेना कुछ ही दिनों में हार गई और रजा शाह को गद्दी छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।

इस्लामिक क्रांति और ईरान–इराक युद्ध

1979 की इस्लामिक क्रांति ने ईरान में सदियों पुरानी राजशाही को खत्म कर एक धर्मतांत्रिक शासन स्थापित किया। इसके तुरंत बाद 1980 में इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने ईरान पर हमला कर दिया। यह युद्ध आठ साल तक चला और 20वीं सदी का सबसे लंबा पारंपरिक युद्ध माना जाता है।

इस संघर्ष में ईरान ने बड़े पैमाने पर जन мобिलाइजेशन की रणनीति अपनाई। भारी जनहानि के बावजूद ईरान अपनी जमीन बचाने में सफल रहा और किसी बड़े क्षेत्रीय नुकसान के बिना युद्ध समाप्त हुआ, हालांकि किसी को स्पष्ट जीत नहीं मिली।

हालिया दौर: बड़े युद्ध से परहेज

2000 के बाद से ईरान ने सीधे बड़े युद्धों से दूरी बनाए रखी है, लेकिन क्षेत्रीय तनाव लगातार बना हुआ है। जून 2025 में ईरान और इजरायल के बीच 12 दिनों तक सीधा मिसाइल संघर्ष हुआ, जिसे बेहद गंभीर टकराव माना गया। हालांकि इस युद्ध का कोई निर्णायक नतीजा नहीं निकला और दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी सफलता का दावा किया।

ईरान का इतिहास क्या बताता है?

ईरान का इतिहास बताता है कि यह देश कई बार हार और तबाही से गुजरा, लेकिन हर बार किसी न किसी रूप में खुद को दोबारा खड़ा करने में सफल रहा। मौजूदा विरोध प्रदर्शनों के बीच भी यही ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ईरान की राजनीतिक और सामाजिक जटिलताओं को समझने में अहम भूमिका निभाती है।

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