Venezuela Crisis: अमेरिकी हमले के बाद मादुरो के समर्थन में क्यों उतरे चीन-रूस, ट्रंप से टकराव या किसी गहरी रणनीति का संकेत?

Venezuela Crisis: अमेरिकी हमले के बाद मादुरो के समर्थन में क्यों उतरे चीन-रूस, ट्रंप से टकराव या किसी गहरी रणनीति का संकेत?

दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला पर अमेरिकी सैन्य कार्रवाई और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो तथा उनकी पत्नी की गिरफ्तारी के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उथल-पुथल तेज हो गई है। चीन और रूस समेत कई देशों ने इस कदम की कड़ी निंदा करते हुए इसे एक संप्रभु राष्ट्र की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर हमला बताया है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि चीन और रूस खुलकर वेनेजुएला के पक्ष में क्यों खड़े हैं—क्या यह केवल अमेरिका से टकराव है या इसके पीछे गहरी कूटनीतिक और आर्थिक वजहें हैं?

अमेरिकी कार्रवाई और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निर्देश पर अमेरिकी फोर्सेज ने वेनेजुएला के कई सैन्य ठिकानों और प्रमुख शहरों पर हवाई हमले किए। इसके बाद राष्ट्रपति मादुरो की गिरफ्तारी की खबर सामने आई। चीन और रूस ने इस कार्रवाई को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताते हुए कहा कि किसी भी देश की सरकार बदलने का अधिकार केवल वहां की जनता को है, किसी बाहरी ताकत को नहीं।

‘रेजीम-चेंज’ नीति के खिलाफ सैद्धांतिक विरोध

चीन और रूस लंबे समय से अमेरिका की रेजीम-चेंज नीति का विरोध करते रहे हैं। इराक, लीबिया, अफगानिस्तान और सीरिया जैसे उदाहरणों को वे खतरनाक मिसाल मानते हैं। उनका मानना है कि यदि वेनेजुएला में अमेरिकी हस्तक्षेप सफल होता है, तो यह मॉडल बन सकता है, जिसके तहत वॉशिंगटन असहमत सरकारों पर प्रतिबंध, सैन्य दबाव या राजनीतिक अलगाव थोपेगा। यही आशंका दोनों देशों को अमेरिका के खिलाफ सैद्धांतिक रूप से खड़ा करती है।

बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की कोशिश

शीत युद्ध के बाद अमेरिका ने खुद को एकमात्र वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित किया। चीन और रूस इस एकध्रुवीय व्यवस्था को चुनौती देकर बहुध्रुवीय दुनिया बनाना चाहते हैं। वेनेजुएला जैसे देशों का समर्थन कर वे यह संदेश देना चाहते हैं कि दुनिया सिर्फ अमेरिकी आदेशों से नहीं चलती और दबाव में आए देश अकेले नहीं हैं।

तेल, ऊर्जा और आर्थिक हित

वेनेजुएला के पास दुनिया के सबसे बड़े सिद्ध तेल भंडार हैं। रूस की ऊर्जा कंपनियों का वहां निवेश है, जबकि चीन दुनिया का सबसे बड़ा ऊर्जा आयातक है। अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते यदि वेनेजुएला पश्चिमी बाजारों से कटता है, तो रूस और चीन को रियायती दरों पर तेल मिलने की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए मादुरो सरकार का समर्थन उनके दीर्घकालिक ऊर्जा और आर्थिक हितों से भी जुड़ा है।

डॉलर आधारित प्रतिबंधों के विकल्प

अमेरिका अक्सर डॉलर-आधारित वित्तीय प्रणाली के जरिए प्रतिबंध लगाता है। चीन और रूस को आशंका है कि भविष्य में वे खुद भी ऐसे प्रतिबंधों के निशाने पर हो सकते हैं। इसी वजह से वे वैकल्पिक भुगतान प्रणालियां, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और नई वित्तीय व्यवस्थाएं विकसित कर रहे हैं। वेनेजुएला को समर्थन देना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

लैटिन अमेरिका में प्रभाव बढ़ाने की रणनीति

लैटिन अमेरिका को लंबे समय तक अमेरिका का प्रभाव क्षेत्र माना जाता रहा है। चीन इंफ्रास्ट्रक्चर, पोर्ट, रेलवे और टेलीकॉम प्रोजेक्ट्स में निवेश कर रहा है, जबकि रूस सैन्य सहयोग और सुरक्षा समझौतों के जरिए अपनी मौजूदगी मजबूत कर रहा है। वेनेजुएला का साथ देना इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा है।

घरेलू राजनीति और वैश्विक संदेश

रूस में नाटो विस्तार और यूक्रेन संकट को लेकर अमेरिका के प्रति अविश्वास है, जबकि चीन ताइवान, व्यापार युद्ध और तकनीकी प्रतिबंधों से खुद को घिरा महसूस करता है। ऐसे में वेनेजुएला पर अमेरिकी हमले की आलोचना कर दोनों देश अपने घरेलू दर्शकों को यह संदेश देते हैं कि वे अमेरिकी दबाव के आगे झुकने वाले नहीं हैं।

क्या यह सिर्फ अमेरिका से दुश्मनी है?

पहली नजर में यह टकराव अमेरिका-विरोध जैसा दिख सकता है, लेकिन हकीकत कहीं ज्यादा जटिल है। इसमें सिद्धांत, ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक हित, बहुध्रुवीय विश्व की सोच, प्रतिबंधों के विकल्प और घरेलू राजनीति—सब शामिल हैं। वेनेजुएला रूस और चीन के लिए केवल एक देश नहीं, बल्कि वह मंच है जहां वे अमेरिकी वैश्विक नेतृत्व को चुनौती दे सकते हैं।

चीन और रूस का वेनेजुएला के साथ खड़ा होना सिर्फ ट्रंप या अमेरिका से दुश्मनी नहीं, बल्कि एक बहुस्तरीय कूटनीतिक, आर्थिक और वैचारिक रणनीति का हिस्सा है। वेनेजुएला आज उस वैश्विक संघर्ष का प्रतीक बन चुका है, जिसमें एक ओर अमेरिकी नेतृत्व वाली पुरानी व्यवस्था है और दूसरी ओर चीन-रूस जैसी ताकतें एक नई बहुध्रुवीय दुनिया की दिशा में कदम बढ़ा रही हैं।

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