आदिवासी राजनीति के दिशोम गुरु का जाना…

आदिवासी राजनीति के दिशोम गुरु का जाना…

नीलोत्पल मृणाल

आज झारखंड की मिट्टी नम है। वो नमी जो सावन के रोज बरसने से नहीं आई बल्कि जब नियति की बिजली कड़की और भारतीय राजनीति के आसमान से एक सितारा टूटा तो झारखंड फूट पड़ा। नदी का पानी इस सावन पहली बार उफना और उफन कर शांत हो चला। झारखंड को एक राज्य के रूप में गढ़ने वाला वास्तुकार अपनी अनंत यात्रा पे निकल गया है।
दिशोम गुरु शिबू सोरेन का जाना एक अडिग संकल्प,एक अनवरत संघर्ष का,एक युग का अवसान है।
गांधी मैदान, दुमका में एक सभा को संबोधित करते हुए शिबू सोरेन ने एक बार कहा था,जिसने जंगल नहीं देखा,वो झारखंड को क्या समझेगा? मैं ठीक इसी बात को बढ़ाते हुए कहना चाहूंगा कि जिसने झारखंड नहीं देखा,वो शिबू सोरेन को क्या समझेगा!

शिबू एक राजनेता का नाम बहुत बाद में है,उससे पहले है एक आंदोलनकारी का संघर्ष।एक विद्रोह का नाम है शिबू सोरेन जो कोयला से लेकर जमीन माफियाओं,महाजनों से लेकर सामंती जमींदारों के सामने आदिवासी संघर्ष का प्रतीक और प्रतिकार बन कर खड़ा होता है।
शिबू सोरेन वैसे लोगों में थे जिन्होंने व्याकरण का ये नियम पलटा है कि संज्ञा के बाद क्रिया आती है, शिबू का संघर्ष जब पत्थलगढ़ी के शिला पर आदिवासी अस्मिता के इतिहास के साथ लिखा जाएगा तो ये ही बताया जाएगा कि जब भी कोई आंदोलनकारी और जनयोद्धा इतिहास की इबारत लिखता है तो क्रिया के बाद संज्ञा आती है।
सोरेन,किसी कुलीन कुल का नाम नहीं,लाखों गरीब,भोले, जंगली आदिवासियों की लड़ाई और उनके साहस का पर्याय बना और इसी ने सोरेन को दिशोम गुरु बनाया, दिशोम गुरु यानि देश का मार्गदर्शक…वो समूह जिसके लिए जंगल की सीमा ही दुनिया की सीमा थी,जिनके लिए जंगल ही उनका ग्लोब था, जिन्होंने कभी भरी नदियों पर पुल बना कर उसे लांघा नहीं और न नदियों को सूखा कर वहां महल उगाए, उनका जंगल ही उनका देश था और इसी देश के कुलगुरु बने शिबू सोरेन।
सत्तर के दशक में जब देश के मुख्यधारा की राजनीति नारे गढ़ने में व्यस्त थी और सत्ता का सिरा कभी दिल्ली,तो कभी लखनऊ या कलकत्ता, पुणे या मुंबई की तरफ खुलता था, शिबू सोरेन संथाल परगना के जंगलों में आदिवासी संघर्ष की मशाल ले कर चल रहे थे।
शिबू सोरेन ने घोषणा की,जमीन नहीं देंगे, कागज नहीं देंगे। जमीन हमारी मां है, इसे कागज पर नहीं बेचेंगे।
कई जगह सशस्त्र विद्रोह किए,जमीन हड़पने वाले महाजनों के खिलाफ उन्हें खदेड़ने को जन अदालतें लगाई।ये सब तब की संवैधानिक और नैतिक राजनीति के दायरे से बाहर की लड़ाई थी।उस ढांचे से बाहर की लड़ाई थी जो संविधान में लिखे और उसके जमीन पर वास्तव में उतरने के फर्क को ठीक से नहीं जांचता था।
इसलिए जब शिबू सोरेन राजनीति के औपचारिक मंच पर एक राजनीतिक दल के साथ उतरे तो उनकी राजनीति में घोषणापत्र नहीं था,आक्रोश की घोषणा थी।
इसलिए शिबू संसद बहुत देर से पहुंचे,पहले स्थापित हुए आदिवासी अस्मिता की चेतना में। शिबू सोरेन की राजनीति आदिवासी समुदाय के बीच दल की नहीं बल्कि लोक आस्था की राजनीति बनी और इसी आस्था ने उनको उस कतार में खड़ा किया जहां बंगाल में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर अपनी सांस्कृतिक चेतना के लिए खड़े होते हैं, सतनाम जैसे पद पंजाब में आध्यात्मिक चेतना के लिए पुकारे जाते हैं,दिशोम गुरु कहाये शिबू आदिवासियों के लिए राजनीतिक,सांस्कृतिक और आध्यात्मिक तीनों चेतना के प्रतीक बन कर खड़े होते हैं।

कोयला मजदूरों और माफियाओं के खिलाफ लड़ने के उस दौर में जब इनके सामने खड़े विद्रोह को मिट्टी में मिला दिया जा सकता था, शिबू मिटे नहीं,मिट्टी में बीज बन कर गिरे और बरगद बन कर उगे।
जीवन तो किसी का भी निष्कलंकित नहीं रहा।
वक्त की आंधी में दिशोम गुरु का बरगद भी कई बार डोला,उसके पत्ते झड़े जब हत्या का आरोप लगा, संसद घुस कांड से लेकर जेल तक गए लेकिन संघर्ष और आंदोलन से तपे हुए उस आदमी की कहानी न एक अध्याय में सिमटी न किसी फैसले से मिटी। जनता ने हार बार उन्हें माफ किया और बार– बार चुना। क्योंकि शिबू सोरेन उस आदिवासी अस्मिता की मशाल ले कर राजपथ के मलमल पर अपने खुरदरे पाँव ले कर चल रहे थे जिस रास्ते से सत्ता कभी भी तक एक ढीबरी तक ले कर नहीं आई थी इन जंगलों में। शिबू तो जब कोयला खदान में उतरे मजदूरों लिए,तो मजदूरों को लगा कि खदान से उनका नेता उजाला लेकर निकलेगा। शिबू वो उम्मीद का उजाला ले कर निकले भी, जब सत्ता के केंद्र में आदिवासी समुदाय की राजनीतिक उपस्थिति और अलग झारखंड राज्य बनने की जिजीविषा को शिबू सोरेन ने ही मूर्त आकार दिया था।
रामगढ़ की घाटी आज उदास है। दुमका के जंगलों में खड़ा सखुआ आज अपने कंधे थोड़ा झुका कर खड़ा है और अभी – अभी बारिशों से हरा हुआ पलाश का पत्ता बारिश की बूंद नहीं, आंसू टपका रहा है।
शिबू सोरेन की देह नहीं रही लेकिन जंगल की सभ्यता के भविष्य में जब तलक कोई वनदेवी अपने बुतरु को पीठ पर टांगे बांस की सूप लेकर महुआ का फल चुनने जाएगी, थक के मड़ुआ और साग कर पानी पीने के बाद उसी पेड़ की छांव में हर आदिवासी मां द्वारा दिशोम गुरु की कहानियां सुनाई जाएंगी।
दिशोम गुरु के संघर्ष का यश झारखंड की जंगलों में सदा लाल पलाश बन कर खिलता रहेगा।ये मृत्यु नहीं है,एक जीवन वापस जंगलों के संगीत में जा कर मिल गया है। विचारधारा और संकल्प की एक पगडंडी थी जो अब रिक्त हो चुकी है लेकिन यहीं से उनके उत्तराधिकारियों लिए एक चुनौती भी निकल कर आती है कि उनके उत्तराधिकारी,उसी संकल्प के साथ ,उसी दृढ़ता और जीवटता के साथ उसी पगडंडी पर चलते हैं या वीरानी को झेलती उस मेढ़ पर वक्त एक दिन अपनी घास उगा देगा। जय हो।

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