मथुरा में खेली जाती है कई तरह की होली, कहीं लट्ठ चलते हैं तो कहीं होती है लड्डू और फूलों की बारिश

मथुरा में खेली जाती है कई तरह की होली, कहीं लट्ठ चलते हैं तो कहीं होती है लड्डू और फूलों की बारिश

मथुरा की होली दुनियाभर में मशहूर है। कान्हा की नगरी में होली का त्योहार न सिर्फ रंगों तक सीमित है, बल्कि यह कई अलग-अलग अनोखे अंदाज में मनाई जाती है। फाल्गुन मास के शुरू होते ही मथुरा, वृंदावन, बरसाना और दाऊजी में होली का रंग बिखरने लगता है। कहीं लट्ठमार होली खेली जाती है, तो कहीं फूलों और लड्डुओं की बारिश होती है। खास बात यह है कि हर जगह की होली का अपना एक विशेष महत्व और परंपरा है।

बरसाने की लट्ठमार होली
बरसाना की लट्ठमार होली दुनियाभर में प्रसिद्ध है। इस अनोखी होली में नंदगांव के पुरुष बरसाना की महिलाओं को रंग लगाने जाते हैं। इस दौरान महिलाएं लाठियों से पुरुषों को मारती हैं, और पुरुष ढाल लेकर अपना बचाव करते हैं। यह परंपरा राधा-कृष्ण के प्रेम और हास-परिहास से जुड़ी मानी जाती है। इस दौरान पूरे बरसाना में होली के गीत गूंजते हैं, और हंसी-ठिठोली का माहौल रहता है।

वृंदावन की फूलों की होली
वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में रंगभरी एकादशी के दिन से होली की शुरुआत होती है। इस दिन मंदिर परिसर में फूलों की होली खेली जाती है। हजारों भक्त अपने आराध्य के साथ गुलाब, गेंदा और अन्य फूलों से होली खेलते हैं। रंगों के बजाय फूलों की इस होली को देखने और खेलने के लिए देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु वृंदावन पहुंचते हैं।

बरसाने की लड्डूमार होली
बरसाना में लड्डूमार होली का विशेष महत्व है। इस दिन नंदगांव के लोग जब राधारानी के गांव बरसाना होली का निमंत्रण देने जाते हैं, तो उनका स्वागत लड्डुओं की वर्षा से किया जाता है। यहां महिलाएं पुरुषों पर लड्डू फेंकती हैं, और सभी लोग आनंद से इस अनोखी होली का हिस्सा बनते हैं।

नंदगांव की होली
बरसाने के बाद नंदगांव में होली खेली जाती है। यहां बरसाना की महिलाएं आती हैं और नंदगांव के पुरुषों को रंगने की कोशिश करती हैं। इस दौरान ढोल-नगाड़ों की धुन पर होली के गीत गाए जाते हैं, और पूरा नंदगांव होली के रंग में सराबोर हो जाता है।

दाऊजी की कोड़ेमार होली
मथुरा से लगभग 22 किलोमीटर दूर बल्देव (दाऊजी) में होली का एक अनोखा रूप देखने को मिलता है। इसे कोड़ेमार होली कहा जाता है। इस होली में पुरुष और महिलाएं एक विशेष रस्म निभाते हैं, जहां महिलाएं पुरुषों को कोड़ों से मारती हैं। इसे हुरंगा भी कहा जाता है। यह परंपरा सदियों पुरानी है और इसमें भाग लेने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं।

गोकुल की छड़ीमार होली
गोकुल में होली का एक और अनोखा रूप देखने को मिलता है, जिसे छड़ीमार होली कहा जाता है। इसमें महिलाएं छड़ी (छोटे डंडे) से पुरुषों को हल्के फटकार मारती हैं, और सभी हंसी-मजाक के साथ इस होली का आनंद लेते हैं।

फूलों से लेकर कोड़ों तक, हर होली का अपना महत्व
मथुरा और उसके आसपास के क्षेत्र में होली का हर रूप अनोखा और रोचक है। जहां एक ओर वृंदावन में फूलों की होली खेली जाती है, वहीं दाऊजी में कोड़ों से होली खेली जाती है। बरसाना की लट्ठमार होली, नंदगांव की रंगों की होली और गोकुल की छड़ीमार होली सभी कृष्ण लीला से प्रेरित हैं।

मथुरा में होली सिर्फ एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि हफ्तों तक चलने वाला एक रंगीन पर्व है, जिसमें भक्तजन और पर्यटक शामिल होकर इसे यादगार बना लेते हैं।

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