नेपाल में नई सरकार किसकी होगी, चीन के खतरे के बीच भारत के लिए क्यों अहम ये चुनाव?

नेपाल में नई सरकार किसकी होगी, चीन के खतरे के बीच भारत के लिए क्यों अहम ये चुनाव?

करीब तीन करोड़ को आबादी वाले देश नेपाल पर इस वक्त दुनिया की महाशक्तियों की नजर है. भारत और चीन के अलावा अमेरिका भी नेपाल में चल रहे चुनाव पर नजर टिकाए हुए है. तीनों ही देशों के हित नेपाल चुनाव से जुड़े हुए हैं.पिछले कुछ सालों में रोटी बेटी के रिश्ते वाले भारत और नेपाल के संबंधों में खटास आई है और नेपाल चीन के तरफ जाता दिखा है.अब इन चुनाव के नतीजों पर भारत की निगाहें टिकी हैं. 

शुरुआती रुझान क्या कह रहे हैं?

शुरुआती रुझानों के मुताबिक,नेपाली कांग्रेस को बढ़त मिलती दिख रही है. ये शेर बहादुर देउबा के नेतृत्व वाला गठबंधन है.जिसमें नेपाली कांग्रेस के अलावा पुष्प कमल दहाल प्रचंड की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल माओइस्ट सेंटर और माधव कुमार नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल- यूनिफाइड सोशलिस्ट हैं.

वहीं केपी शर्मा ओली के नेतृत्व में दूसरा गठबंधन है जिसमें कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल  (सीपीएन- यूएमएल), प्रजातंत्र पार्टी (आरपीपी) है.

नेपाली कांग्रेस के देउबा को भारत का करीबी और केपी शर्मा ओली को चीन का करीबी माना जाता है. केपी ओली का भारत को लेकर जो रवैया रहा है, उस पर बहस होती रही है. ओली को लेकर ऐसा नजरिया उनके प्रधानमंत्री कार्यकाल के दौरान किए गए फैसले और टिप्पणियां को देखते हुए बनाया गया है.

चीन के करीब कैसे है ओली

ओली ने सत्ता में रहने के दौरान भी कई बार चीन के कहने पर भारत से रिश्ते खराब कर लिए थे. इसके अलावा नेपाल में  चुनाव प्रचार के दौरान भी भारत के खिलाफ अपने देश के लोगों में नफरत का बीज बोने और दुष्प्रचार करने की कोशिश की थी. केपी ओली ने प्रचार के दौरान कहा था कि अगर हम सत्ता में आते हैं तो नेपाल के उन हिस्सों को वापस लाएंगे जिस पर भारत अपना दावा करता है. 

ओली ने लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को नेपाल में शामिल करने का वादा किया है. ये वो जगहें हैं जिन्हें भारत उत्तराखंड का हिस्सा मानता हैं. ओली भारत पर उन्हें सत्ता से हटाने का आरोप भी लगा चुके हैं. इसके अलावा अयोध्या पर भी उनकी टिप्पणी विवादों में रही थी.

भारत के साथ देउबा के रिश्ते

वहीं दूसरी तरफ ओली के मुकाबले देउबा की छवि भारत के साथ घनिष्ठ संबंधों के पक्षधर की रही है. भारत के राजनयिक हलकों में देउबा को एक परिपक्व राजनेता के रूप में देखा जाता रहा है. इसी साल वो भारत के दौरे पर भी आए और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात भी की और दोनों देशों के संबंधों को मजबूत बनाने की बात भी कही थी. नेपाल की देउबा सरकार ने भारत दौरे पर आकर एक बार फिर भारत से संबंध सुधार की कोशिश में है. मोदी सरकार भी इस दिशा में संजीदगी से जुड़ी लग रही है.  

ओली के शासन के दौरान बिगड़े भारत नेपाल के रिश्ते

साल 2015 में नेपाल का संविधान बदला गया था. जिसके बाद से भारत ने पड़ोसी देश नेपाल से अपना संपर्क काट लिया था. क्योंकि यह देश ज्यादातर सामानों के लिए आयात पर निर्भर है और उसका रास्ता भारत के रास्ते से होकर जाता है इसलिए उस दौरान नेपाल को  काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा था. 

केपी ओली के कार्यकाल के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अप्रैल 2020 में लिपुलेख में क़रीब 5,200 मीटर रोड का उद्घाटन किया था. जिसके खिलाफ सत्ताधारी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी ने कहा था कि लिपुलेख में भारत का सड़क बनाना उसकी संप्रभुता का उल्लंघन है.नेपाल की तरफ़ से जो बयान जारी किए गए थे उसपर तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी ओली के हस्ताक्षर थे. 

इसके अलावा भारत और नेपाल के बीच सुस्ता और कालापानी इलाके को लेकर भी विवाद हुए है. 6 साल पहले सुस्ता और कालापानी को लेकर विदेश सचिव के स्तर की बातचीत करने को लेकर सहमति बनी थी, लेकिन इतने सालों बाद भी अब तक बैठक नहीं हुई है. कार्यकाल के दौरान जब ओली भारत आए तब भी द्विपक्षीय वार्ताओं में इनका ज़िक्र नहीं हुआ. नेपाल में बढ़ रहा चीन का प्रभाव भी भारत के लिए चिंता का विषय है. यही वजह है कि भारत नेपाल की राजनीति पर करीबी निगाह रखे हुए है.

अभी नेपाल में है किसकी सत्ता

वर्तमान में नेपाल में नेपाली कांग्रेस की सत्ता है और शेर बहादुर देउबा प्रधानमंत्री हैं. भारत और नेपाल के रिश्तों की बात करें तो दोनों देशों के बीच दशकों से दोस्ताना संबंध है. यही कारण है कि इसलिए दोनों देशों के लोगों को भारत या नेपाल आने के लिए वीजा की जरूरत नहीं पड़ती. 

देउवा और ओली के बीच कांटे की टक्कर 

चुनाव में दो चेहरों के बीच जोरदार टक्कर है. शेरबहादुर देउबा के नेतृत्व में सत्तारुढ़ नेपाली कांग्रेस गठबंधन और मुख्य विपक्षी नेता केपी ओली के बीच मुख्त मुकाबला होता नजर आ रहा है. देउबा के इस गठबंधन में देउबा की पार्टी नेपाली कांग्रेस, प्रचण्ड की पार्टी माओवादी केंद्र, माधव नेपाल की यूनीफाइड सोशलिस्ट पार्टी, महन्थ ठाकुर की लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी शामिल है. दूसरी तरफ ओली के नेतृत्व में नेपाल कम्यूनिष्ट पार्टी और उपेन्द्र यादव के नेतृत्व वाली जनता समाजवादी पार्टी ने गठबंधन किया है.

बदलती रही है सरकारें 

भारत के पड़ोसी देश नेपाल में लोकतंत्र स्थापित होने के 32 सालों में यहां 32 सरकारें रही हैं. यहां साल 1990 में लोकतंत्र की स्थापना हुई थी और साल 2008 में राजशाही को खत्म कर दिया गया था. इस देश में साल 2008 के बाद से अब तक पिछले चौदह सालों में दस सरकारें आईं-गईं हैं. इस देश में बदलते गठबंधनों और सरकारों ने लोगों में राजनीतिक व्यवस्था के प्रति निराशा को जन्म दिया है. इसी के जवाब में इस बार हुए चुनाव के दौरान कई नए चेहरे पुराने राजनेताओं को टक्कर देने के लिए मैदान में उतरे हैं. 

नेपाल चुनाव पर क्यों टिकी हैं नजरें

आज के मतगणना के बाद नेपाल में किस पार्टी की जीत होती है उस पर ना सिर्फ भारत की ही बल्कि चीन और अमेरिका की भी नजरें टिकी हुई है. चीन के साथ अपनी बढ़ती प्रतिस्पर्धा को देखते हुए अमेरिका इस देश में अपनी पैठ जमाने और दबदबा बढ़ाने की कोशिश में लगा हुआ है. भारत और चीन के साथ तो नेपाल जुड़ा हुआ है ही लेकिन अमेरिका भी अब इस देश के साथ 50 करोड़ डॉलर के अमेरिका समर्थित मिलेनियम चैलेंज कॉरपोरेशन (MCC) में शामिल है.

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