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अंचित शुली का संघर्ष: पिता चलाते थे रिक्शा-मां ने की सिलाई, भाई ने अपना सपना छोड़ पूरा किया भाई का सपना

अंचित शुली का संघर्ष: पिता चलाते थे रिक्शा-मां ने की सिलाई, भाई ने अपना सपना छोड़ पूरा किया भाई का सपना

Anchita Sheuli. कॉमनवेल्थ गेम्स 2022 में भारत का तीसरा गोल्ड दिलाने वाले अंचित शूली ने जिन परिस्थितियों में देश को खुश होने का मौका दिया है, वह प्रेरित करने वाला है। बेहद गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाले अंचित शुली ने अपने खेल के दम पर जमीन से आसमान तक सफर तय किया है। पश्चिम बंगाल के एक गरीब परिवार में जिम्मेदारियों का बोझ उठाने वाले अंचिता एक दिन करोड़ों भारतीयों के उम्मीदों का बोझ उठाएंगे, ऐसा कम ही लोगों ने सोचा होगा। लेकिन भारत को तीसरा गोल्ड और वेटलिफ्टिंग में 6ठां मेडल दिलाने वाले अंचित शुली ने कमाल का खेल दिखाया है।

313 किलो वजन उठाया  
20 साल के अंचित शुली ने 73 किलोग्राम भारवर्ग में पार्टिसिपेट किया। अंचित ने स्नैच में 143 किलो का वजन उठाया। क्लीन एंड जर्क के पहले प्रयास में 166 किलो और तीसरे प्रयास में 170 किलोग्राम का वजन उठाया। अंचित दूसरे प्रयास में फेल भी हुए लेकिन तीसरे प्रयास में 170 किलो वजन उठाकर कुल 313 किलो वजन उठाया। यह कॉमनवेल्थ के लिए भी एक रिकॉर्ड है। खास बात यह रही कि उन्होंने सिल्वर जीतने वाले मलेशियाई खिलाड़ी से 10 किलो ज्यादा वजन उठाया। अंचित शुली ने इससे पहले 2021 में जूनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल जीता था।

गरीबी से पोडियम तक का सफर
पश्चिम बंगाल के रहने वाले अंचित शुली की कहानी बहुत प्रेरक है। जब अंचित सिर्फ 10 साल के थे तो एक दिन पतंग पकड़ते-पकड़ते वे लोकर जिम तक जा पहुंचे। वहां बड़ा भाई आलोक वेट लिफ्टिंग की प्रैक्टिस करते थे। अंचित को यही से प्रेरणा मिली और उनका झुकाव वेटलिफ्टिंग की तरफ हुआ। हालांकि परिवार की माली हालात बहुत खराब थी। पिता जगत साइकिल रिक्शा चलाते थे और मजदूरी मिलने पर मजदूर का काम भी करते थे ताकि परिवार की जरूरतें पूरी हो सकें। 2013 में पिता की अचानक मौत ने अंचिता के परिवार के सामने बड़ा संकट खड़ा कर दिया। पिता की मौत के बाद अंचिता के भाई आलोक का सपना भी टूट गया। आलोक ने वेटलिफ्टिंग छोड़ दी और परिवार के जिम्मेदारी के लिए काम करने लगे। मां ने भी सिलाई-बुनाई का काम शुरू कर दिया ताकि बच्चों का पेट पाल सकें।

 

भाई ने की भरपूर मदद
पिता की मौत के बाद बड़े भाई आलोक ने खुद वेटलिफ्टर बनने का सपना छोड़ दिया लेकिन उन्होंने अंचित को वेटलिफ्टर बनाने का सपना संजो लिया। अंचित भी टूट चुके थे और खेल से दूरी बनाना चाहते थे क्योंकि घर की हालत ही ऐसी थी। लेकिन जिला स्तर, जूनियर लेवल और नेशनल स्तर पर अंचित के प्रदर्शन ने आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। आलोक कहते हैं कि मैं जो भी पैसे बचाता था, कोशिश करता था कि अंचिता की डाइट पूरी कर सकूं। हमने बहुत कम संसाधनों में भी प्रैक्टिस शुरू की और अंचित लगातार बेहतर प्रदर्शन करते रहे।

ऐसे आगे बढ़ा सफर 
अंचित के बेहतर प्रदर्शन ने उन्हें ऐसे पोजीशन पर ला दिया कि एक फाउंडेशन ने उनकी मदद की। 2019 में रिलायंस फाउंडेशन यूथ स्पोर्ट ने अपने एलीट एथलीट स्कॉलरशिप प्रोग्राम के तहत अंचित का चयन किया। इस प्रोग्राम ने न सिर्फ आर्थिक मदद की बल्कि स्पोर्ट्स सोइकोथेरेपिस्ट और स्पोर्ट्स साइंस स्पेशलिस्ट भी अंचित के लिए उपलब्ध कराए। फाउंडेश के हॉस्पिटल में अंचित के न्यूट्रीशंस, स्ट्रेंथ एंड कंडीशनिंग, साइकोलॉजिक और डेटा एनालिसिस की व्यवस्था कि ताकि वे इंटरनेशनल कंपीटिशन के लिए पूरी तरह से तैयार हो सकें।

 

पीएम मोदी ने दी बधाई
कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीतने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंचित शुली को बधाई दी। उन्होंने ट्वीट कर कहा कि अंचित से हमने टूर्नामेंट शुरू होने से पहले बात की थी। उनकी मां व भाई ने जो त्याग किया है, वह प्रेरणादायी है। पीएम ने कहा कि उम्मीद है कि गोल्ड जीतने के बाद अब वे अच्छी फिल्म देख सकेंगे।

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