
अल्मोड़ा, 24 अक्टूबर 2021
उत्तराखंड में अगले साल विधानसभा के चुनाव होने हैं. इससे पहले अक्टूबर में आई आपदा ने प्रदेश के सियासी माहौल को गर्मा दिया है. आपदा के बाद पीड़ित लोगों का दर्द जानने और उनकी पीड़ा को कम करने को लेकर प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा और प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस के बीच होड़ मची है. दोनों दलों के नेता आपदा पीड़ितों के साथ दुख की घड़ी में उनके साथ खड़े होने का दावा कर रहे हैं. और इसके साथ ही एक-दूसरे को जनता का कम हितैषी साबित करने की कवायद भी चल रही है.
दरअसल, उत्तराखंड में आपदाओं को लेकर राजनीति, नई नहीं है. राज्य में 2013 में हुई केदारनाथ त्रासदी का दंश लोग अभी भूले नहीं हैं. प्रकृति की कठोर यातना के साथ भी सियासत के तार जुड़े हैं, क्योंकि केदारनाथ की त्रासदी के बाद ही तत्कालीन विजय बहुगुणा की सरकार ने सत्ता गंवा दी थी. ऐसे में जब बीते दिनों उत्तराखंड को एक और प्राकृतिक आपदा से दो-चार होना पड़ा और उसके बाद कांग्रेस व भाजपा के नेताओं के बीच सियासी प्रतिद्वंद्विता सामने आई, तो लोगों को बरबस ही बहुगुणा सरकार की याद आने लगी है.
आपदा के समय चमका रहे सियासत
उत्तराखंड में भारी बारिश के कारण हुई तबाही से पीड़ित लोगों का दुख-दर्द बांटने को लेकर जिस तरह से बीजेपी और कांग्रेस के नेताओं में होड़ मची है, उससे लोग हैरान भी हैं. लोगों को हैरानी
इस बात पर हो रही है कि आपदा के समय भी हर पार्टी सियासत चमकाने का प्रयास कर रही है. खासकर भाजपा और कांग्रेस तो इस मुद्दे पर एक-दूसरे के आमने-सामने खड़ी नजर आ रही है.
दर्जनों की जान गई, सैकड़ों हुए बेघर
राज्य में अक्टूबर की आपदा ने दर्जनों लोगों की जान ले ली और सैकड़ों को बेघर कर दिया है. सड़कें बंद होने से जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गई हैं. लोगों के घर-बार उजड़ गए हैं, फसलें तबाह हो गई हैं. ऐसे में जाहिर है जब पीड़ित मदद के लिए सियासी दलों की ओर नजर दौड़ाते हैं, तो उन्हें सियासी हलचल ही नजर आती है. जाहिर है ऐसे में सियासत के जानकारों को 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद बहुगुणा सरकार के पतन की याद आ जाती है. इसके साथ ही 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले हो रही ‘आपदा वाली सियासत’ पर चर्चाएं शुरू हो जाती हैं.
विपक्ष के आगे तेवर में दिख रही भाजपा
बारिश के कारण आई आपदा के बाद प्रशासनिक अव्यवस्था को लेकर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस सत्तारूढ़ भाजपा पर हमलावर है. इसके जवाब में बीजेपी की तरफ से भी माकूल जवाब दिए जा रहे हैं. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने तो कांग्रेस पर युवाओं का मनोबल कम करने की बात का आरोप भी लगाया है. साथ ही यह भी कहा कि राहत के समय कांग्रेस के नेता लापता रहते हैं.
सरकार को घेरने में कसर नहीं छोड़ रही कांग्रेस
इसके जवाब में कांग्रेस भी सरकार को घेरने का कोई मौका चूक नहीं रही है. प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत लगातार नैनीताल और अल्मोड़ा के आसपास के इलाकों में आपदा पीड़ितों के घर-घर जाकर उनका हाल जान रहे हैं और इस दौरान सरकार को निशाने पर भी ले रहे हैं. पूर्व सीएम आपदा के समय राज्य सरकार की लापरवाही भरी रणनीति पर हमला करते हैं, साथ ही यह बताना नहीं भूलते कि आपदा के एक हफ्ते बाद सीएम धामी ग्राउंड जीरो पर पहुंचे.
ये पब्लिक है, सब कुछ जानती है
बहरहाल, 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव की घोषणा से कुछ महीने पहले उत्तराखंड में आपदा को लेकर जिस तरह सियासत गर्माई हुई है, उससे जनता भी सभी दलों के नेताओं को समझने का प्रयास कर रही होगी. सत्तारूढ़ और विपक्षी दलों के नेताओं के आरोप-प्रत्यारोपों के बीच जनता किसे अपना सच्चा हितैषी मानेगी, यह तो आने वाले चुनाव के परिणाम से ही सामने आएगा.







