31 साल, जेल और जनसमर्थन: पप्पू यादव की राजनीति क्यों हर गिरफ्तारी के बाद और मज़बूत हो जाती है?, पूरी कहानी

इतिहास ने एक बार फिर करवट ली है। 6 फरवरी की देर रात पटना पुलिस ने 31 साल पुराने गर्दनीबाग थाना कांड संख्या 552/95 में पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया। इस गिरफ्तारी के साथ ही बिहार की राजनीति में उबाल आ गया है। राज्य के अलग–अलग हिस्सों में उनके समर्थन में प्रदर्शन हो रहे हैं और यह मामला अब सिर्फ कानून तक सीमित न रहकर राजनीतिक टकराव का रूप ले चुका है।

यह पहला मौका नहीं है जब पप्पू यादव की गिरफ्तारी ने सियासी भूचाल खड़ा किया हो। इससे पहले 11 मई 2021 को, कोविड संकट के चरम दौर में, 32 साल पुराने अपहरण मामले में मधेपुरा पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेजा था। तब भी यही सवाल उठा था—कानूनी प्रक्रिया या राजनीतिक प्रतिशोध?
दोनों ही मामलों में गिरफ्तारी न्यायिक दायरे में हुई, लेकिन समर्थकों का मानना है कि समय और परिस्थितियां इत्तेफाक नहीं थीं।


क्यों उठ रहा है ‘राजनीतिक बदले’ का सवाल

पप्पू यादव के समर्थकों का दावा है कि 2021 में उनकी गिरफ्तारी इसलिए हुई क्योंकि उन्होंने सारण सांसद राजीव प्रताप रूड़ी से जुड़ी एम्बुलेंस रिपोर्ट को मुखरता से उठाया था। वहीं इस बार गिरफ्तारी को नीट छात्रा मामले में सरकार और पुलिस के खिलाफ उनकी लगातार आवाज़ से जोड़कर देखा जा रहा है।
यही वजह है कि गिरफ्तारी के बाद उनका राजनीतिक कद घटने के बजाय और ज़्यादा चर्चा में आ गया है।


विवादों के बीच चढ़ता राजनीतिक ग्राफ

पप्पू यादव का राजनीतिक जीवन हमेशा विवादों, टकरावों और अप्रत्याशित मोड़ों से भरा रहा है। उनके बयान, उनका अंदाज़ और सत्ता से टकराने की प्रवृत्ति उन्हें बार-बार सुर्खियों में लाती रही है। समर्थक उन्हें गरीबों का मसीहा मानते हैं, तो विरोधी दबंग और बाहुबली कहने से नहीं चूकते।
यही विरोधाभास उनकी राजनीति की पहचान बन गया है।

जेल में रहते हुए लिखी गई उनकी किताब ‘द्रोहकाल का पथिक’ उनके संघर्ष, सोच और व्यक्तित्व को गहराई से सामने लाती है—एक ऐसा नेता जो खुद को सिस्टम का विद्रोही मानता है।


छह बार सांसद, विरोधाभासों से भरा राजनीतिक जीवन

करीब 35 वर्षों की राजनीतिक यात्रा में पप्पू यादव 6 बार सांसद और 1 बार विधायक रहे हैं। इनमें से 3 बार निर्दलीय सांसद और 1 बार निर्दलीय विधायक बनना उनकी राजनीति की सबसे अलग पहचान है।
खुद पप्पू यादव कहते हैं—
“निर्दलीय सांसद बनना भगवान के भी बस की बात नहीं।”

साल 2015 में उन्हें सर्वश्रेष्ठ सांसद का सम्मान मिला। यही नहीं, वे और उनकी पत्नी रंजीत रंजन एक साथ सांसद बनने वाले चुनिंदा दंपतियों में शामिल हैं।


जेल, जनसेवा और जनसमर्थन

पप्पू यादव करीब 17 साल जेल में बिता चुके हैं। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर उनका जनाधार कमजोर नहीं पड़ा। कोविड काल में अस्पतालों से लेकर श्मशान तक उनकी सक्रियता चर्चा में रही। दिल्ली स्थित उनके आवास पर बीमारों के लिए चलाया गया सेवाश्रम आज भी उनके समर्थक याद करते हैं।


अजीत सरकार हत्याकांड: जिसने दिशा बदल दी

14 जून 1998 को पूर्णिया में हुए अजीत सरकार हत्याकांड ने पप्पू यादव की जिंदगी की दिशा बदल दी। इस मामले में उनकी गिरफ्तारी हुई, केस सीबीआई को सौंपा गया और 2008 में उम्रकैद की सजा सुनाई गई।
करीब 15 साल बेउर और तिहाड़ जेल में बिताने के बाद 2013 में पटना हाई कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया। इसके बाद उन्होंने 2004 में मधेपुरा से शरद यादव को हराकर राजनीति में ज़ोरदार वापसी की।


अत्यंत महत्वाकांक्षी नेता

पप्पू यादव की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है उनकी अडिग संघर्ष क्षमता। हार के बावजूद हार न मानना।
2019 लोकसभा और 2020 विधानसभा चुनाव में पराजय के बाद भी उन्होंने 2024 में पूर्णिया से निर्दलीय जीत दर्ज की। इसे उनकी ज़िद, नेटवर्क और जमीनी पकड़ का नतीजा माना गया।

जो उन्हें करीब से जानते हैं, वे कहते हैं कि पप्पू यादव सिर्फ महत्वाकांक्षी नहीं, बल्कि अत्यंत महत्वाकांक्षी हैं। यही महत्वाकांक्षा उन्हें किसी एक दल में टिकने नहीं देती और बार-बार विद्रोह की राह पर ले जाती है।

कथित तौर पर उनका यह जुमला मशहूर है—
“DM बन नहीं सका, PM बन नहीं सकता, जब तक CM नहीं बन जाता—चैन कहां!”


राजनीतिक संकट को अवसर में बदलने की कला

कम लोग जानते हैं कि तिहाड़ जेल में रहते हुए पप्पू यादव ने IGNOU से आपदा प्रबंधन में डिप्लोमा किया। आज उनके समर्थक कहते हैं कि वही आपदा प्रबंधन का सिद्धांत वे अपनी राजनीति में भी लागू करते हैं—
हर संकट को अवसर में बदलना। फिलहाल, 31 साल पुराने मामले में गिरफ्तारी ने एक बार फिर उन्हें सियासी केंद्र में ला खड़ा किया है। देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह नया संकट भी उनके लिए एक और राजनीतिक उछाल साबित होता है, या फिर उनकी महत्वाकांक्षा किसी नए मोड़ पर जाकर ठहरती है।

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