30 जनवरी भारतीय इतिहास का वह दिन है, जो हमें केवल एक महान व्यक्ति की पुण्यतिथि नहीं, बल्कि विचार, साहित्य और नैतिकता की विरासत की याद दिलाता है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को आमतौर पर स्वतंत्रता आंदोलन के नायक के रूप में जाना जाता है, लेकिन उनका साहित्यिक योगदान उतना ही व्यापक, गहरा और कालजयी है। वे केवल आंदोलनकारी नहीं थे, बल्कि ऐसे लेखक थे जिनकी कलम समाज की आत्मा से संवाद करती थी।
गांधी जी का लेखन किसी कल्पना या अलंकार का प्रदर्शन नहीं था। उनका साहित्य जीवन के कठोर अनुभवों, आत्मसंघर्ष और नैतिक प्रश्नों से जन्मा था। वे जो जीते थे, वही लिखते थे और जो लिखते थे, वही जीने की कोशिश करते थे। यही कारण है कि उनका लेखन आज भी उपदेश नहीं, बल्कि संवाद की तरह पढ़ा जाता है।
उनकी आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ भारतीय साहित्य की सबसे ईमानदार कृतियों में मानी जाती है। इसमें गांधी जी स्वयं को महिमामंडित नहीं करते, बल्कि अपनी कमजोरियों, असफलताओं और भ्रमों को भी खुलकर स्वीकार करते हैं। यह पुस्तक बताती है कि सत्य कोई स्थिर अवस्था नहीं, बल्कि निरंतर आत्मपरीक्षण की प्रक्रिया है। साहित्य में ऐसी आत्मस्वीकृति दुर्लभ है, और यही इसे विशेष बनाती है।
गांधी जी की प्रसिद्ध रचना ‘हिंद स्वराज’ केवल राजनीतिक दस्तावेज नहीं, बल्कि गहरे सामाजिक और दार्शनिक विचारों की पुस्तक है। इसमें उन्होंने आधुनिक सभ्यता, मशीनों पर निर्भरता, उपभोक्तावाद और नैतिक पतन पर सवाल उठाए। वे मानते थे कि अगर विकास मनुष्य को नैतिक रूप से कमजोर बना दे, तो वह प्रगति नहीं कहलाएगी। यह पुस्तक आज के दौर में और भी प्रासंगिक लगती है, जब समाज भौतिक प्रगति और मानवीय मूल्यों के बीच उलझा हुआ है।
पत्रकारिता के क्षेत्र में गांधी जी का योगदान भी ऐतिहासिक है। नवजीवन, यंग इंडिया और हरिजन जैसे पत्रों के जरिए उन्होंने लेखन को जनआंदोलन का औज़ार बनाया। उनका लेखन सत्ता के खिलाफ था, लेकिन भाषा में कटुता नहीं, बल्कि सत्य की दृढ़ता थी। वे मानते थे कि शब्दों की शुद्धता भी उतनी ही ज़रूरी है जितनी विचारों की।
गांधी जी के लेखन का सबसे बड़ा गुण उसकी सरलता है। वे कठिन से कठिन विचार को भी आम भाषा में कह देते थे। यही कारण है कि उनका साहित्य शिक्षित वर्ग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आम जन तक पहुँचा। उनका विश्वास था कि अगर विचार जनता की भाषा में नहीं हैं, तो वे केवल किताबों में कैद रह जाते हैं।
एक साहित्यिक व्यक्तित्व के रूप में गांधी जी हमें यह सिखाते हैं कि लेखक का दायित्व केवल सौंदर्य रचना नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी भी है। उनका लेखन हमें सवाल पूछना सिखाता है—अपने समय से, अपनी सत्ता से और सबसे ज़्यादा, स्वयं से।
30 जनवरी को गांधी जी को याद करना केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि उस साहित्यिक चेतना को जीवित रखना है, जो सत्य, अहिंसा और करुणा को शब्दों में ढालती है।
गांधी जी की कलम आज भी हमें याद दिलाती है कि साहित्य वही है, जो मनुष्य को बेहतर मनुष्य बनाए।




