आज राधाकृष्ण की पुण्यतिथि हमें हिंदी साहित्य के उस सजग, संवेदनशील और विचारशील रचनाकार की याद दिलाती है, जिसने शब्दों को केवल सौंदर्य का माध्यम नहीं, बल्कि समाज और मनुष्य को समझने का औज़ार बनाया। राधाकृष्ण उन साहित्यकारों में थे जिनकी रचनाएँ शोर नहीं मचातीं, बल्कि चुपचाप पाठक के भीतर उतर जाती हैं। उनकी पुण्यतिथि केवल एक लेखक को याद करने का दिन नहीं, बल्कि उस वैचारिक परंपरा को स्मरण करने का अवसर है जिसमें साहित्य जीवन से सीधा संवाद करता है।
राधाकृष्ण का साहित्यिक व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे कहानीकार, उपन्यासकार, नाटककार और आलोचक के रूप में समान रूप से सक्रिय रहे। उनकी रचनाओं में आधुनिक जीवन की जटिलताएँ, व्यक्ति का आंतरिक संघर्ष, नैतिक द्वंद्व और सामाजिक यथार्थ गहराई से उभरकर आता है। वे न तो पूरी तरह आदर्शवादी थे और न ही निराशावादी; बल्कि उन्होंने जीवन को उसकी पूरी जटिलता और विरोधाभासों के साथ स्वीकार किया।
उनकी कहानियों की विशेषता यह है कि वे घटनाओं से अधिक मन:स्थितियों पर केंद्रित रहती हैं। पात्र बाहरी संघर्षों से ज़्यादा भीतर टूटते, सवाल करते और अपने अस्तित्व से जूझते दिखाई देते हैं। राधाकृष्ण की भाषा सधी हुई, संयत और प्रभावशाली है—बिना अनावश्यक अलंकरण के भी वह गहरी संवेदना रच देती है। उनकी रचनाओं में मौन भी बहुत कुछ कहता है।
राधाकृष्ण के उपन्यास और नाटक सामाजिक चेतना से जुड़े हुए हैं। उन्होंने मध्यवर्गीय जीवन, नैतिक मूल्यों के क्षरण, संबंधों की जटिलता और आधुनिक मनुष्य की अकेलेपन की पीड़ा को बहुत ईमानदारी से चित्रित किया। उनके पात्र किसी एक समय या स्थान तक सीमित नहीं रहते, बल्कि हर युग के पाठक को अपने जैसे लगते हैं। यही कारण है कि उनका साहित्य आज भी प्रासंगिक बना हुआ है।
एक आलोचक और विचारक के रूप में भी राधाकृष्ण का योगदान महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने साहित्य को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को देखने-समझने की गंभीर प्रक्रिया माना। उनकी आलोचना दृष्टि संतुलित थी—वे न अंधी प्रशंसा करते थे और न ही निराधार खंडन। उनका लेखन साहित्यिक परंपरा और आधुनिक दृष्टि के बीच सेतु का काम करता है।
राधाकृष्ण की पुण्यतिथि पर जब हम उन्हें स्मरण करते हैं, तो यह एहसास और गहरा हो जाता है कि सच्चा साहित्य समय से आगे चलता है। भले ही लेखक देह से विदा हो जाए, उसकी संवेदना, विचार और शब्द पीढ़ियों तक जीवित रहते हैं। राधाकृष्ण भी ऐसे ही साहित्यकार हैं—जो आज नहीं हैं, लेकिन जिनका साहित्य आज भी हमारे प्रश्नों का उत्तर बनने की कोशिश करता है।




