आज राजेश विवेक की जयंती है—और ऐसे दिन किसी कलाकार को याद करना सिर्फ़ तारीख़ निभाना नहीं, बल्कि उसकी संवेदना को दोबारा पढ़ना होता है। राजेश विवेक हिंदी सिनेमा के उन दुर्लभ अभिनेताओं में थे, जिनका मूल्यांकन फ़िल्मों की संख्या से नहीं, उनके भीतर बसे अनुभव से किया जाना चाहिए। उनका चेहरा, उनकी आवाज़ और उनकी देहभाषा मिलकर ऐसा असर रचते थे, जो संवादों से आगे जाकर दर्शक से बात करता था। साहित्य जिस तरह मनुष्य के भीतर उतरकर उसकी बेचैनी, डर और करुणा को उजागर करता है, राजेश विवेक का अभिनय भी उसी परंपरा का विस्तार लगता था।
उनका अभिनय शास्त्रीय रंगमंच और लोकनाट्य की उस परंपरा से जुड़ा दिखाई देता है, जहाँ कलाकार सिर्फ़ मनोरंजन नहीं करता, बल्कि समाज का आईना बनता है। उनके पात्र अक्सर हाशिए पर खड़े लोग होते थे—थोड़े असहज, थोड़े हास्यपूर्ण, लेकिन भीतर से बेहद संवेदनशील। यही वह बिंदु है जहाँ उनका अभिनय साहित्य के सबसे क़रीब पहुँच जाता है। उनके किरदार किसी उपन्यास के उन चरित्रों जैसे थे, जो मुख्य कथा में कम दिखते हैं, लेकिन कथा की आत्मा वही होते हैं।
फ़िल्म लगान का “गोली” उनके जीवन का सबसे चर्चित पात्र रहा, लेकिन उसे केवल हास्य के दायरे में देखना उस किरदार की गहराई को नज़रअंदाज़ करना होगा। गोली दरअसल उस आम भारतीय का प्रतीक था, जो अपनी बात पूरी तरह कह नहीं पाता, लेकिन चुप भी नहीं रह सकता। राजेश विवेक ने इस पात्र में मासूमियत, भय, आत्म-संकोच और प्रतिरोध—सब कुछ इस तरह पिरोया कि वह चरित्र आज भी सामूहिक स्मृति में जीवित है। यही गुण किसी साहित्यिक पात्र को कालजयी बनाता है।
राजेश विवेक की सबसे बड़ी ताक़त उनकी चुप्पी थी। वे उन अभिनेताओं में थे जिनका मौन भी संवाद बन जाता था। कैमरे के सामने उनका ठहर जाना, नज़रें चुरा लेना या अचानक स्थिर हो जाना—ये क्षण किसी लिखे हुए संवाद से ज़्यादा गहरे असर छोड़ते थे। यह गुण साहित्य के उस सिद्धांत से मेल खाता है, जहाँ कहा जाता है कि जो नहीं लिखा गया, वही सबसे ज़्यादा बोलता है। उनकी चुप्पी प्रेमचंद के पात्रों की चुप्पी जैसी थी—साधारण दिखने वाली, लेकिन भीतर से बहुत भारी।
राजेश विवेक को कभी “स्टार” नहीं कहा गया, लेकिन वे उस अर्थ में कलाकार थे, जिस अर्थ में साहित्यकार होता है—जो चमक के लिए नहीं, सच्चाई के लिए रचता है। उनका अभिनय शहरी बनावट से दूर, मिट्टी की गंध लिए हुए था। वे गाँव, कस्बे और साधारण मनुष्य की भाषा समझते थे। शायद यही कारण था कि उनके चेहरे पर अभिनय नहीं, जीवन दिखाई देता था। वे सिनेमा में उस लोकबोध के प्रतिनिधि थे, जो आज धीरे-धीरे दुर्लभ होता जा रहा है।
आज उनकी जयंती पर राजेश विवेक को याद करना किसी कलाकार को याद करना भर नहीं है, बल्कि उस परंपरा को सलाम करना है जहाँ अभिनय मनुष्यता से उपजता था। वे हमें याद दिलाते हैं कि सिनेमा और साहित्य अलग-अलग माध्यम ज़रूर हैं, लेकिन दोनों की आत्मा एक ही है—संवेदना। राजेश विवेक अपने पात्रों के ज़रिये आज भी हमारे बीच मौजूद हैं, ठीक वैसे ही जैसे कोई अच्छा साहित्य—जो पढ़ लिए जाने के बाद भी लंबे समय तक मन में गूंजता रहता है।



