भुगतान में देरी पर हाई कोर्ट सख्त, पैगंबर मोहम्मद के उपदेश से वकील को 19 साल बाद मिला न्याय ; जानें पूरा मामला

भुगतान में देरी पर हाई कोर्ट सख्त, पैगंबर मोहम्मद के उपदेश से वकील को 19 साल बाद मिला न्याय ; जानें पूरा मामला

मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने वर्षों पुराने एक भुगतान विवाद में अहम और मिसाल बनने वाला फैसला सुनाया है। इस मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस जी. आर. स्वामीनाथन ने न सिर्फ कानूनी पहलुओं पर ध्यान दिया, बल्कि नैतिक और मानवीय मूल्यों को भी फैसले का आधार बनाया।

भुगतान से जुड़े इस विवाद में जज ने पैगंबर मोहम्मद के प्रसिद्ध उपदेश का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति को उसके काम का मेहनताना समय पर मिलना चाहिए। कोर्ट ने माना कि काम पूरा होने के बाद भुगतान में अनावश्यक देरी करना अन्याय है। इसी सोच के साथ हाई कोर्ट ने पूर्व वकील के पक्ष में फैसला सुनाया और संबंधित संस्था को बकाया राशि चुकाने का निर्देश दिया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि न्याय केवल कानून तक सीमित नहीं होता, बल्कि उसमें इंसाफ, नैतिकता और मानवीय संवेदना भी शामिल होनी चाहिए।

भुगतान को लेकर क्या कहा कोर्ट ने

जज स्वामीनाथन ने कहा कि काम पूरा होने के बाद मेहनताना तुरंत दिया जाना चाहिए। उन्होंने पैगंबर मोहम्मद के उस कथन का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया है कि मजदूर या कर्मचारी को उसकी मेहनत का फल उसके पसीने के सूखने से पहले मिल जाना चाहिए। इसी आधार पर कोर्ट ने मदुरै नगर निगम को अपने पूर्व स्थायी वकील की बकाया फीस चुकाने का आदेश दिया।

भारी फीस लेने की प्रथा पर नाराजगी

कोर्ट ने एक ही पेशी के लिए बहुत ज्यादा फीस पर वकील रखने की परंपरा पर कड़ी आपत्ति जताई। जज ने एक उदाहरण देते हुए बताया कि एक वरिष्ठ वकील को एक सुनवाई के लिए 4 लाख रुपये तक दिए गए। उन्होंने सवाल उठाया कि जब कोई विश्वविद्यालय या सरकारी संस्था यह कहती है कि उसके पास रिटायर्ड कर्मचारियों का बकाया चुकाने के पैसे नहीं हैं, तो फिर वही संस्था वकीलों को इतनी मोटी फीस कैसे दे रही है।

पीटीआई की रिपोर्ट में क्या कहा गया

पीटीआई के मुताबिक, जज ने यह भी कहा कि कई छोटे मामलों में भी अतिरिक्त एडवोकेट जनरल पेश होते हैं, जबकि ऐसे मामलों को सामान्य सरकारी वकील भी संभाल सकते हैं। उन्होंने कहा कि यह सब केवल पैसे के लिए किया जा रहा है। कोर्ट ने साफ कहा कि अब लॉ अधिकारियों को दी जाने वाली फीस की जांच और ऑडिट होनी चाहिए।

किसने दायर की थी याचिका

नगर निगम के पूर्व स्थायी वकील पी. थिरुमलई ने अदालत में याचिका दायर की थी। उन्होंने मांग की थी कि नगर निगम को उनके बकाया 13.05 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया जाए। 19 दिसंबर को दिए आदेश में जज ने दोहराया कि कर्मचारी को समय पर मेहनताना मिलना उसका हक है।

क्या है पूरा मामला

याचिकाकर्ता साल 1992 से 2006 तक, यानी करीब 14 साल से ज्यादा समय तक मदुरै नगर निगम के स्थायी वकील रहे। इस दौरान उन्होंने मदुरै जिला अदालतों में निगम की तरफ से पैरवी की। उनका आरोप था कि निगम ने उनकी पूरी फीस का भुगतान नहीं किया।
उनके मुताबिक कुल 14.07 लाख रुपये देय थे, लेकिन निगम ने सिर्फ 1.02 लाख रुपये ही दिए। बाकी 13.05 लाख रुपये लंबे समय से बकाया थे। इस दौरान उन्होंने करीब 818 मामलों में पेश होकर काम किया और भुगतान न मिलने की वजह से उनकी आर्थिक स्थिति भी खराब हो गई।

कोर्ट का अंतिम आदेश

इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए हाई कोर्ट ने मदुरै जिला न्यायालय से जुड़े विधि सेवा प्राधिकरण को मामलों की सूची की जांच करने, जरूरी दस्तावेज जुटाने और दो महीने के भीतर उपलब्ध कराने का आदेश दिया। साथ ही नगर निगम को निर्देश दिया गया कि वह बिना किसी ब्याज के अगले दो महीनों में पूर्व वकील की पूरी बकाया राशि का भुगतान करे।इस फैसले के साथ ही करीब 19 साल बाद पूर्व वकील को न्याय मिला।

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