बंगाल में ओवैसी की एंट्री: 30% मुस्लिम आबादी, 110 सीटों पर असर,क्या ध्रुवीकरण बिगाड़ देगा ममता बनर्जी का सियासी गणित?

पश्चिम बंगाल में अगले विधानसभा चुनाव भले अभी दूर हों, लेकिन सियासी तापमान तेज़ी से चढ़ने लगा है। इसी बीच असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व वाली ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के चुनावी मैदान में उतरने के संकेतों ने राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। सवाल सीधा है—क्या AIMIM की मौजूदगी बंगाल में दशकों से निर्णायक रहे मुस्लिम वोट को बांटेगी, और अगर ऐसा हुआ तो इसका फायदा किसे मिलेगा? सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए यह चुनौती कितनी बड़ी हो सकती है?


मुस्लिम फैक्टर: संख्या, भूगोल और चुनावी ताक़त

जनगणना 2011 के मुताबिक पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी 27.01% थी। बीते एक दशक में जनसांख्यिकीय रुझानों और राज्यस्तरीय आकलनों के आधार पर यह हिस्सेदारी 30% के आसपास मानी जाती है। यह आबादी राज्य में समान रूप से नहीं फैली है, बल्कि कुछ जिलों में अत्यधिक सघन है। मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर जैसे जिलों में मुस्लिम आबादी आधी या उससे अधिक है, जबकि उत्तर और दक्षिण 24 परगना, बीरभूम, नादिया के कई इलाकों में उनका वोट निर्णायक प्रभाव रखता है।
इसी भूगोल के कारण 294 सदस्यीय विधानसभा में करीब 100 से 110 सीटें ऐसी मानी जाती हैं, जहां मुस्लिम मतदाता चुनावी नतीजे तय करने की स्थिति में होते हैं। यह संख्या किसी भी दल के लिए सत्ता का रास्ता खोल या बंद कर सकती है।


इतिहास क्या कहता है: वाम से तृणमूल तक

2006 तक बंगाल में मुस्लिम वोट पर वाम मोर्चा का प्रभाव माना जाता था। इसके बाद राजनीतिक हवा बदली और यह वोट धीरे-धीरे तृणमूल कांग्रेस की ओर शिफ्ट हुआ। 2011 और 2016 के विधानसभा चुनावों में यही बदलाव ममता बनर्जी की जीत का आधार बना।
बीजेपी के उभार के साथ 2019 और 2021 के चुनावों में ध्रुवीकरण बढ़ा, लेकिन इसके बावजूद मुस्लिम वोट का बड़ा हिस्सा तृणमूल के साथ बना रहा। यही वजह है कि तृणमूल के रणनीतिकार मुस्लिम वोट में किसी भी तरह की सेंध को सबसे बड़ा जोखिम मानते हैं।


ओवैसी की एंट्री क्यों बदल सकती है समीकरण

बीते वर्षों में भारतीय जनता पार्टी के मजबूत होने से बंगाल में धार्मिक ध्रुवीकरण तेज़ हुआ है। ऐसे माहौल में AIMIM की एंट्री को कई विश्लेषक वोट-स्प्लिट के संभावित कारण के तौर पर देखते हैं।
अगर मुस्लिम वोट का एक छोटा हिस्सा भी AIMIM की ओर गया, तो कई सीटों पर तृणमूल का मार्जिन प्रभावित हो सकता है। यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा है कि ओवैसी की मौजूदगी अप्रत्यक्ष रूप से बीजेपी के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है—हालांकि बीजेपी सार्वजनिक तौर पर ऐसी किसी निर्भरता से इनकार करती है।


गठबंधन का प्रस्ताव और टकराव

बिहार विधानसभा चुनावों के बाद ओवैसी ने खुले तौर पर बीजेपी को रोकने के लिए ममता बनर्जी को चुनाव-पूर्व गठबंधन का प्रस्ताव दिया था। तृणमूल ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया। इससे पहले ममता बनर्जी AIMIM पर यह आरोप भी लगा चुकी हैं कि वह बीजेपी से “मदद लेकर” बंगाल में पैर जमाने की कोशिश कर रही है।
यह टकराव बताता है कि दोनों पक्ष एक-दूसरे को रणनीतिक खतरे के रूप में देखते हैं—एक ओर तृणमूल अपने कोर वोट बैंक को सुरक्षित रखना चाहती है, दूसरी ओर AIMIM खुद को अल्पसंख्यकों के लिए एक वैकल्पिक मंच के तौर पर पेश कर रही है।


योजनाएँ बनाम ‘तुष्टिकरण’ का आरोप

ममता सरकार ने सत्ता में रहते हुए अल्पसंख्यकों के लिए कई योजनाएँ लागू कीं—मदरसा सहायता, छात्रवृत्तियाँ, इमाम-मौलवियों को आर्थिक मदद। विपक्षी दल इन योजनाओं को ‘तुष्टिकरण’ बताते रहे हैं, जबकि तृणमूल का दावा है कि यह समावेशी कल्याण का हिस्सा है।
इसी बहस के बीच AIMIM यह तर्क देती है कि अल्पसंख्यकों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति अब भी बेहतर विकल्प की मांग करती है।


AIMIM की तैयारी और ज़मीनी दावे

AIMIM के नेताओं का दावा है कि पार्टी ने बंगाल के 23 में से 22 जिलों में अपनी संगठनात्मक इकाइयाँ खड़ी कर ली हैं और सर्वे के बाद सीटों का चयन किया जाएगा। पार्टी का मानना है कि तृणमूल से नाराज़ मुस्लिम मतदाताओं को वह एक नया राजनीतिक विकल्प दे सकती है।
वहीं तृणमूल नेता AIMIM को वोटकटवा बताते हैं; कांग्रेस और वाम दल उसे बीजेपी की ‘बी-टीम’ करार देते हैं; और बीजेपी कहती है कि उसे सत्ता के लिए किसी बाहरी सहारे की जरूरत नहीं।


किस दिशा में जाएगा मुस्लिम वोट?

बंगाल में 30% मुस्लिम आबादी और 110 तक विधानसभा सीटों पर उसका प्रभाव—यह गणित किसी भी चुनाव का परिणाम तय कर सकता है। AIMIM की एंट्री से सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मुस्लिम वोट एकजुट रहेगा या बंटेगा।
अगर ध्रुवीकरण बढ़ा और वोट विभाजन हुआ, तो ममता बनर्जी का अब तक का सियासी संतुलन चुनौती में पड़ सकता है। लेकिन अगर तृणमूल अपने कोर वोट को थामे रखने में सफल रही, तो ओवैसी की एंट्री सीमित प्रभाव तक सिमट भी सकती है। यही वजह है कि बंगाल की राजनीति में आने वाले महीनों में मुस्लिम फैक्टर सबसे निर्णायक मुद्दा बना रहेगा।

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