देश में प्रीमियम ट्रेनें क्यों हो रहीं लेट? क्या कोहरा ही है देरी की एकमात्र वजह

वंदे भारत, राजधानी, शताब्दी और तेजस जैसी प्रीमियम ट्रेनों का नाम आते ही यात्रियों के मन में तेज रफ्तार और समय की पाबंदी की छवि बनती है। लेकिन जब यही ट्रेनें अपने तय समय से 6 से 12 घंटे तक देरी से पहुंचने लगें, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या इसकी वजह सिर्फ उत्तर भारत में छाया घना कोहरा है या फिर रेलवे सिस्टम से जुड़ी कुछ और बड़ी चुनौतियां भी इसके पीछे काम कर रही हैं?

प्रीमियम ट्रेनों की समयपालन चुनौती

भारतीय रेलवे की प्रीमियम ट्रेनें आधुनिक कोच, बेहतर सुविधाओं और तेज गति के लिए जानी जाती हैं। इसके बावजूद बीते कुछ समय से उत्तर भारत के कई प्रमुख रूटों पर इन ट्रेनों की समयपालन व्यवस्था प्रभावित हुई है।
दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब और हरियाणा से गुजरने वाली वंदे भारत, राजधानी और शताब्दी जैसी ट्रेनें लगातार देरी का सामना कर रही हैं। यह समस्या किसी एक दिन या एक ही रूट तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे नेटवर्क में देखने को मिल रही है।

कोहरा अहम कारण, लेकिन पूरी कहानी नहीं

सर्दियों में उत्तर भारत में पड़ने वाला घना कोहरा रेलवे संचालन के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है। कई बार दृश्यता 50 मीटर से भी कम रह जाती है, जिससे लोको पायलट को सिग्नल देखने में दिक्कत होती है।
सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए ट्रेनों की गति घटानी पड़ती है और कुछ मामलों में ट्रेन को स्टेशन पर रोकना भी जरूरी हो जाता है। यही वजह है कि प्रीमियम ट्रेनें भी अपने निर्धारित समय से काफी पीछे चलने लगती हैं। हालांकि रेलवे विशेषज्ञ मानते हैं कि कोहरा एक बड़ी वजह जरूर है, लेकिन अकेली वजह नहीं।

ट्रैक मेंटेनेंस और बुनियादी ढांचे की दिक्कतें

रेलवे ट्रैक की मरम्मत और रखरखाव सुरक्षा के लिहाज से जरूरी है, लेकिन यही काम कई बार ट्रेनों की समय-सारिणी बिगाड़ देता है।
कई रूटों पर ट्रैक सुधार कार्य के चलते ट्रेनों को वैकल्पिक मार्गों से भेजा जाता है या कुछ समय के लिए रोका जाता है। व्यस्त रूटों पर इसका असर और भी ज्यादा देखने को मिलता है, जिससे प्रीमियम ट्रेनों की रफ्तार पर ब्रेक लग जाता है।

तकनीकी खराबियां भी बढ़ा रहीं परेशानी

आधुनिक सिग्नल सिस्टम और इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव के बावजूद तकनीकी समस्याएं पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं।
सिग्नल फेल होना, ओवरहेड इलेक्ट्रिक लाइन में खराबी, इंजन से जुड़ी दिक्कतें या पॉवर सप्लाई में रुकावट—ये सभी कारण ट्रेन लेट होने की बड़ी वजह बनते हैं। चूंकि प्रीमियम ट्रेनें सीमित समय में लंबी दूरी तय करती हैं, इसलिए थोड़ी सी तकनीकी रुकावट भी घंटों की देरी में बदल जाती है।

व्यस्त रूट और ट्रैफिक का दबाव

भारतीय रेलवे के कई प्रमुख रूट पहले से ही अत्यधिक व्यस्त हैं। एक ट्रेन के लेट होने का असर पीछे चल रही कई अन्य ट्रेनों पर पड़ता है, जिससे पूरा नेटवर्क प्रभावित होता है।
कुछ परिस्थितियों में मालगाड़ियों को प्राथमिकता दी जाती है, जिसका असर यात्री ट्रेनों पर पड़ता है। ऐसे में प्रीमियम ट्रेनों को भी साइड में खड़ा करना पड़ता है, जिससे देरी और बढ़ जाती है।

स्टाफ की कमी भी बन रही वजह

त्योहारों और छुट्टियों के मौसम में अतिरिक्त ट्रेनों के संचालन के लिए ज्यादा स्टाफ की जरूरत होती है।
कई बार लोको पायलट, गार्ड, टीटीई और अन्य कर्मचारियों की कमी के कारण ट्रेनें समय पर रवाना नहीं हो पातीं। यह समस्या भी देरी को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाती है।

रेलवे की तैयारी और दावे

भारतीय रेलवे का कहना है कि कोहरे और मौसम से जुड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।
वंदे भारत, राजधानी और शताब्दी जैसी ट्रेनों के लिए अतिरिक्त रेक तैयार रखे जा रहे हैं, ताकि किसी तकनीकी या परिचालन समस्या की स्थिति में सेवाएं प्रभावित न हों। साथ ही सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए जरूरत पड़ने पर गति नियंत्रण जैसे कदम उठाए जाते हैं।

रेलवे अधिकारियों के मुताबिक, यात्रियों की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जा सकता और इसी वजह से कई बार देरी अपरिहार्य हो जाती है।

कुल मिलाकर, प्रीमियम ट्रेनों के लेट होने के पीछे सिर्फ कोहरा ही नहीं, बल्कि ट्रैक मेंटेनेंस, तकनीकी खराबियां, व्यस्त रूट, ट्रैफिक दबाव और स्टाफ की कमी जैसे कई कारण मिलकर काम कर रहे हैं। ऐसे में यात्रियों को सर्दियों के मौसम में यात्रा की योजना बनाते समय अतिरिक्त समय को ध्यान में रखना जरूरी हो गया है।

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