अगर भारत रूस से एक बूंद भी तेल न खरीदे, तो रूस को कितना होगा नुकसान? समझिए पूरा हिसाब-किताब

क्या भारत वाकई रूस से कच्चा तेल खरीदना पूरी तरह बंद कर सकता है? अमेरिका के साथ हालिया ट्रेड डील के बाद यह सवाल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में है। भले ही रूस ने साफ कहा हो कि उसे भारत की ओर से ऐसा कोई आधिकारिक संदेश नहीं मिला है, लेकिन अगर ऐसा फैसला वास्तव में लिया जाता है, तो इसके असर सिर्फ भारत या रूस तक सीमित नहीं रहेंगे—पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था इसकी चपेट में आ सकती है।

यह सवाल क्यों उठा?

अमेरिका और भारत के बीच हुई ट्रेड डील के बाद पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक बयान ने हलचल बढ़ा दी। ट्रंप ने दावा किया कि भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर देगा। इसके जवाब में रूस ने कहा कि भारत की तरफ से न तो कोई पत्र मिला है और न ही किसी आधिकारिक बातचीत में ऐसा संकेत दिया गया है। इसके बावजूद बाजार में अटकलें तेज हो गईं कि अगर भारत ऐसा करता है, तो रूस को कितना नुकसान झेलना पड़ेगा।

भारत रूस से कितना तेल खरीदता है?

वित्त वर्ष 2024–25 में भारत ने अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 35 से 40 प्रतिशत हिस्सा रूस से खरीदा। यह मात्रा रोज़ाना करीब 15 से 20 लाख बैरल बैठती है।
साल 2024 में भारत ने रूस से जो तेल खरीदा, उसकी कुल कीमत करीब 52.7 अरब डॉलर आंकी गई। यूरोप द्वारा रूसी तेल पर पाबंदियां लगाने के बाद भारत रूस का सबसे बड़ा तेल खरीदार बनकर उभरा है।

रूस को सीधा आर्थिक झटका कितना होगा?

अगर भारत अचानक रूसी तेल खरीदना पूरी तरह बंद कर देता है, तो रूस की कमाई पर सीधा और बड़ा असर पड़ेगा। हर साल मिलने वाले अरबों डॉलर एक झटके में रुक सकते हैं। यह पैसा रूस के बजट, सामाजिक योजनाओं और रक्षा खर्च—खासतौर पर युद्ध संबंधी खर्च—के लिए बेहद अहम है।
इतना बड़ा ग्राहक खोने के बाद रूस को नया बाजार ढूंढना होगा, वह भी भारी छूट देकर।

तेल बेचने में रूस की बढ़ेंगी मुश्किलें

भारत के हटने के बाद रूस के विकल्प सीमित रह जाएंगे।

  • चीन एक बड़ा खरीदार है, लेकिन वह भी सस्ते दामों पर ही तेल खरीदेगा।
  • छोटे और दूर देशों तक तेल भेजने के लिए लंबी शिपिंग करनी पड़ेगी, जिससे लागत बढ़ेगी।
  • पश्चिमी प्रतिबंधों के चलते रूस पहले से ही तथाकथित शैडो फ्लीट पर निर्भर है, जो महंगी और जोखिम भरी मानी जाती है।

भू-राजनीतिक असर भी अहम

रूस के लिए तेल सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि रणनीतिक ताकत का बड़ा स्रोत है। इसी कमाई से यूक्रेन युद्ध जैसे सैन्य अभियानों को फंड मिलता है।
अगर भारत जैसा बड़ा और भरोसेमंद खरीदार पीछे हटता है, तो रूस की वित्तीय और कूटनीतिक स्थिति कमजोर पड़ सकती है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी सौदेबाजी की ताकत भी घटेगी।

क्या रूस पूरी तरह टूट जाएगा?

हालांकि यह मानना गलत होगा कि भारत के हटते ही रूस पूरी तरह संकट में आ जाएगा। तेल बिकेगा, लेकिन रास्ता और कीमत बदल जाएगी।
अगर सप्लाई को लेकर अनिश्चितता बढ़ती है, तो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमत 10 से 15 डॉलर प्रति बैरल तक बढ़ सकती है। इससे रूस को कुछ हद तक नुकसान की भरपाई मिल सकती है, भले ही उसे तेल सस्ते दामों पर बेचना पड़े।

भारत पर क्या असर पड़ेगा?

इस फैसले का असर भारत पर भी कम नहीं होगा।
रूस से मिलने वाला सस्ता तेल भारत को बड़ी राहत देता रहा है। अगर यह सप्लाई बंद होती है, तो भारत को मिडिल ईस्ट जैसे इलाकों से महंगा तेल खरीदना पड़ेगा।
अनुमान है कि इससे भारत का सालाना तेल आयात बिल 9 से 12 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है। इसका सीधा असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों, महंगाई और आम आदमी की जेब पर पड़ेगा।

अगर भारत रूस से तेल खरीदना पूरी तरह बंद करता है, तो यह फैसला रूस की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा झटका होगा, लेकिन इसके असर वैश्विक तेल बाजार और भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था तक महसूस किए जाएंगे। यही वजह है कि फिलहाल इसे एक रणनीतिक दबाव और अटकलों के तौर पर देखा जा रहा है, न कि तय नीति के रूप में।

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