शब्दों की साधना: अशोक गुप्ता की साहित्यिक यात्रा और एक लेखक का जन्मदिवस

शब्दों की साधना: अशोक गुप्ता की साहित्यिक यात्रा और एक लेखक का जन्मदिवस

29 जनवरी—यह तारीख हिंदी साहित्य के समकालीन परिदृश्य में एक शांत लेकिन अर्थपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराती है। इसी दिन अशोक गुप्ता का जन्म हुआ—एक ऐसे लेखक का, जिसने तकनीकी शिक्षा और प्रशासनिक जीवन के अनुशासन को साहित्य की संवेदनशीलता से जोड़ा। जन्मदिवस के इस अवसर पर उनका लेखन हमें याद दिलाता है कि साहित्य किसी एक पेशे या पृष्ठभूमि की बपौती नहीं, बल्कि अनुभव, दृष्टि और ईमानदार संवेदना का परिणाम होता है।

अशोक गुप्ता का जीवन-यात्रा देहरादून से शुरू होती है। इंजीनियरिंग की पढ़ाई और प्रबंधन से जुड़ा पेशेवर जीवन उनके हिस्से आया, लेकिन मन का झुकाव हमेशा साहित्य की ओर रहा। यही कारण है कि तकनीकी नौकरी के वर्षों के बीच भी लेखन उनके भीतर लगातार जीवित रहा—कहानियों, कविताओं, समीक्षाओं और आलेखों के रूप में। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने लेखन को अपना मुख्य कर्म बनाया और पूरी तन्मयता से साहित्य को समय दिया।

उनकी पहचान मुख्यतः कहानीकार के रूप में बनी। अशोक गुप्ता की कहानियाँ जीवन के छोटे-छोटे लेकिन निर्णायक क्षणों को पकड़ती हैं—जहाँ व्यक्ति व्यवस्था से टकराता है, परिवार और समाज के बीच अपनी जगह तलाशता है, और स्मृतियों की विरासत से संवाद करता है। उनकी भाषा अनावश्यक अलंकरण से दूर, सीधी और असरदार है; कथ्य में मानवीय करुणा और यथार्थ का संतुलन दिखाई देता है।

प्रकाशन की दृष्टि से देखें तो उनकी रचनाएँ विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं में स्थान पाती रही हैं। तीन कहानी-संग्रह और एक उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। उनका उपन्यास ‘विरासत’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिसे हिंदी अकादमी, दिल्ली से सम्मान मिला—यह सम्मान न केवल कृति का, बल्कि उस लेखकीय दृष्टि का भी है जो परंपरा और वर्तमान के बीच पुल बनाती है। लेखन में वे किसी वाद या तात्कालिक शोर के पीछे नहीं भागते; उनका आग्रह मनुष्य और उसके समय को ईमानदारी से दर्ज करने का है।

अशोक गुप्ता के लेखन की एक और विशेषता है—अनुशासन। शायद यही उनके इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि का प्रभाव है। कथानक की संरचना, पात्रों की गति और संवाद की कसी हुई लय उनके यहाँ सहज रूप से मिलती है। यह अनुशासन संवेदना को सीमित नहीं करता, बल्कि उसे स्पष्टता देता है। वे मानते हैं कि साहित्य का उद्देश्य पाठक को चौंकाना नहीं, बल्कि उसे भीतर तक छू लेना है।

समकालीन हिंदी साहित्य में अशोक गुप्ता का स्थान किसी प्रचारित लोकप्रियता से तय नहीं होता, बल्कि निरंतरता और गुणवत्ता से बनता है। वे उन लेखकों में हैं जो मंच से ज़्यादा काग़ज़ पर भरोसा करते हैं—जहाँ समय ही अंतिम निर्णायक होता है। आज भी उनका लेखन जारी है; नए उपन्यास और रचनात्मक प्रयोग उनकी सृजनशीलता की निरंतरता का संकेत देते हैं।

और अंत में, फिर वही तारीख—29 जनवरी। यह केवल एक जन्मदिवस नहीं, बल्कि उस यात्रा की याद है जिसमें शब्दों ने तकनीकी जीवन से निकलकर साहित्य की दुनिया में अपना घर बनाया। अशोक गुप्ता का जन्मदिवस हमें यह सोचने का अवसर देता है कि साहित्य किन-किन रास्तों से आता है और कैसे साधारण जीवन के अनुभव असाधारण रचनाओं में ढल जाते हैं। उनके लिए और उनके पाठकों के लिए, यह दिन शब्दों के साथ एक शांत, लेकिन गहरे संवाद का दिन है।

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