इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के हालिया बयान ने मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्ध को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। उन्होंने दावा किया कि ईरान अब परमाणु हथियार और मिसाइल बनाने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि अमेरिका और इजरायल के हमलों ने उसकी सैन्य क्षमताओं को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। इस बयान के दो मायने निकाले जा रहे हैं—पहला, ईरान को वाकई भारी नुकसान हुआ है; दूसरा, अमेरिका और इजरायल अब इस युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता तलाश रहे हैं।
क्या ईरान को भारी नुकसान हुआ है?
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ईरान को इस युद्ध में बड़ा झटका लगा है। कई शीर्ष सैन्य और राजनीतिक नेताओं की मौत हुई है, जिनमें सुप्रीम लीडर के करीबी लोग भी शामिल बताए जा रहे हैं। अमेरिका और इजरायल ने ईरान के मिसाइल बेस, ड्रोन क्षमता और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। यहां तक कि हिंद महासागर में ईरान का एक युद्धपोत भी डुबोने का दावा किया गया है। इसके अलावा, ईरान के तेल और गैस इंफ्रास्ट्रक्चर को भी भारी नुकसान पहुंचाया गया है। साउथ पार्स जैसे अहम गैस फील्ड पर हमले हुए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस युद्ध में अब तक हजारों लोगों की जान जा चुकी है, जिससे देश की आंतरिक स्थिति भी प्रभावित हुई है।
क्यों खत्म नहीं हो रहा युद्ध?
हालांकि ईरान को नुकसान हुआ है, लेकिन वह अब भी मजबूती से टिका हुआ है और जवाबी हमले जारी रखे हुए है। यही वजह है कि यह युद्ध उम्मीद से ज्यादा लंबा खिंच गया है। अमेरिका और इजरायल ने शायद यह नहीं सोचा था कि प्रतिबंधों से जूझ रहा ईरान इतनी लंबी लड़ाई लड़ पाएगा। ईरान ने इस संघर्ष को क्षेत्रीय सीमाओं से बाहर निकालते हुए मिडिल ईस्ट के कई देशों तक फैला दिया है। UAE, सऊदी अरब और ओमान जैसे देशों में हमलों की खबरें सामने आई हैं। दुबई जैसे शहर भी खतरे के दायरे में आ गए हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ गई है।
इस युद्ध का असर अब पूरी दुनिया पर दिखने लगा है। ईरान ने तेल और गैस सप्लाई से जुड़े अहम रास्तों और इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया है। कतर के रास लाफान गैस प्लांट पर हमले और होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही पर असर ने वैश्विक ऊर्जा संकट को गहरा दिया है। कई देशों में गैस और ईंधन की कमी हो रही है। पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे देशों में ऊर्जा संकट बढ़ गया है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय दबाव अमेरिका और इजरायल पर बढ़ रहा है कि वे इस युद्ध को खत्म करें, क्योंकि इसका खामियाजा पूरी दुनिया भुगत रही है।
अमेरिका और इजरायल के सामने चुनौतियां
इस युद्ध ने अमेरिका की कूटनीतिक स्थिति को भी चुनौती दी है। तेल संकट के चलते अमेरिका को अपने रुख में बदलाव करना पड़ा है। वहीं रूस और चीन जैसे देश इस स्थिति का अप्रत्यक्ष फायदा उठा रहे हैं, जिससे अमेरिका पर सवाल उठ रहे हैं। दूसरी तरफ, अमेरिका और इजरायल के बीच मतभेद भी सामने आने लगे हैं। कुछ हमलों को लेकर दोनों देशों के बीच अलग-अलग रुख देखने को मिला है। इससे यह संकेत मिलता है कि दोनों के बीच रणनीतिक एकरूपता कमजोर पड़ रही है।
क्या अब बाहर निकलने की कोशिश?
नेतन्याहू के बयान को इस नजरिए से भी देखा जा रहा है कि शायद अमेरिका और इजरायल अब इस युद्ध से “सम्मानजनक तरीके” से बाहर निकलना चाहते हैं। युद्ध पर भारी खर्च, अंतरराष्ट्रीय दबाव और स्पष्ट जीत न मिलने के कारण दोनों देशों पर दबाव बढ़ रहा है। अमेरिका हर दिन इस युद्ध पर भारी खर्च कर रहा है और आंतरिक स्तर पर भी इसको लेकर मतभेद बढ़ रहे हैं। वहीं, ईरान में सत्ता परिवर्तन का लक्ष्य भी अभी तक हासिल नहीं हो सका है। ऐसे में बिना स्पष्ट जीत के युद्ध जारी रखना दोनों देशों के लिए मुश्किल होता जा रहा है।
कुल मिलाकर, नेतन्याहू का बयान सिर्फ सैन्य उपलब्धि का दावा नहीं, बल्कि एक संभावित रणनीतिक संकेत भी हो सकता है। ईरान कमजोर जरूर हुआ है, लेकिन पराजित नहीं। ऐसे में अमेरिका और इजरायल के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या अब इस युद्ध को खत्म करने का समय आ गया है, या फिर यह संघर्ष और लंबा खिंचेगा?




