कुछ स्मरण केवल कैलेंडर के अंक नहीं होते, वे समय को रोककर सवाल करने का अवसर बन जाते हैं। स्वामी विवेकानंद की जयंती भी ऐसा ही एक क्षण है, जहाँ श्रद्धा से पहले आत्मचिंतन आता है और शब्दों से पहले मौन। यह दिन किसी उत्सव से ज़्यादा भीतर झाँकने की ज़रूरत बन जाता है।
विवेकानंद को केवल संत कहना उन्हें सीमित करना है। वे विचार थे—चलते हुए, बेचैन, जागते हुए। उनका संन्यास संसार से भागने की घोषणा नहीं था, बल्कि संसार को समझने की गहरी ज़िम्मेदारी थी। उन्होंने त्याग को कमजोरी नहीं बनने दिया, बल्कि उसे शक्ति का रूप दिया।
उनके लिए धर्म किसी कर्मकांड का नाम नहीं था। धर्म वह ऊर्जा था जो मनुष्य को निर्भीक बनाती है, उसे आत्मसम्मान देती है और अन्याय के सामने खड़े होने का साहस पैदा करती है। जब वे कहते हैं कि कमज़ोरी पाप है, तो यह किसी पर आरोप नहीं, बल्कि मनुष्य को उसकी सोई हुई शक्ति की याद दिलाने का प्रयास है।
शिकागो के मंच से उठी उनकी आवाज़ केवल एक ऐतिहासिक भाषण नहीं थी। वह उस भारत का आत्मपरिचय थी, जो गुलामी में भी अपनी चेतना नहीं भूला था। “सिस्टर्स एंड ब्रदर्स ऑफ अमेरिका” एक संबोधन नहीं था, वह पूरे विश्व के सामने एक सभ्यता का आत्मविश्वास था।
विवेकानंद का युवा आज की भाषा में आदर्श नहीं था। वह प्रश्न करता था, भटकता था, संघर्ष करता था, लेकिन भीतर से टूटा हुआ नहीं था। वे युवाओं से भावुकता नहीं चाहते थे, वे साहस चाहते थे; वे सपनों से ज़्यादा संकल्प पर भरोसा करते थे।
आज का समय बहुत तेज़ है। सूचनाएँ बहुत हैं, लेकिन ठहराव कम है। हर तरफ़ आवाज़ है, लेकिन सुनने की क्षमता कम होती जा रही है। ऐसे समय में विवेकानंद किसी शोर की तरह नहीं आते, वे एक ठहराव की तरह आते हैं—धीरे, लेकिन गहराई से।
उनके विचार नारे नहीं बनते। वे भीतर उतरते हैं, असहज करते हैं और मनुष्य को उसके ही सवालों से रू-बरू कराते हैं। वे यह नहीं बताते कि दुनिया कैसी होनी चाहिए, वे पूछते हैं कि मनुष्य खुद को कैसे देख रहा है।
जयंती पर फूल चढ़ाना आसान है। कठिन है उनके विचारों को जीवन में जगह देना—निर्भीक होना, आत्मनिर्भर होना और सच के साथ खड़े रहने का साहस रखना। शायद इसी कठिनाई में विवेकानंद आज भी ज़रूरी बने रहते हैं।
आज उनकी जयंती है।
और जयंती का अर्थ स्मरण नहीं, आत्मपरीक्षण है।




