द फ्रंट डेस्क: संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की सिविल सेवा परीक्षा देश की सबसे प्रतिष्ठित और कठिन परीक्षाओं में से एक मानी जाती है। हर साल लाखों उम्मीदवार इस परीक्षा में शामिल होते हैं और रिजल्ट आने के बाद पूरे देश में चर्चा का माहौल बन जाता है। लेकिन कई बार परिणाम जारी होने के बाद नामों की समानता या अधूरी जानकारी के कारण भ्रम की स्थिति भी पैदा हो जाती है। हाल ही में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर की शिखा गौतम का मामला सामने आया, जहां उन्होंने UPSC सिविल सेवा परीक्षा में 113वीं रैंक हासिल करने का दावा कर दिया था। हालांकि बाद में जांच में पता चला कि यह रैंक दिल्ली की रहने वाली एक अन्य अभ्यर्थी की है। सच्चाई सामने आने के बाद शिखा और उनके परिवार ने अपनी गलती स्वीकार कर ली। यह घटना कोई पहली बार नहीं है। इससे पहले भी 301वीं रैंक को लेकर आकांक्षा सिंह नाम की दो उम्मीदवारों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हो चुकी है। इन दोनों मामलों ने यह सवाल खड़ा किया है कि आखिर UPSC जैसे बड़े परिणामों के बाद इस तरह की गलतफहमियां क्यों फैल जाती हैं।
शिखा गौतम का मामला: नाम देखकर कर दिया चयन का दावा
बुलंदशहर की रहने वाली शिखा गौतम ने UPSC रिजल्ट आने के बाद दावा किया कि उन्होंने 113वीं रैंक हासिल कर सिविल सेवा परीक्षा पास कर ली है। यह खबर तेजी से सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर फैल गई। परिवार और परिचितों ने उन्हें बधाइयां देनी शुरू कर दीं और घर में जश्न जैसा माहौल बन गया। लेकिन बाद में जब परिणाम की पूरी सूची की जांच की गई तो पता चला कि यह रैंक दिल्ली की एक अन्य अभ्यर्थी शिखा की है। जांच में सामने आया कि शिखा गौतम ने UPSC द्वारा जारी रिजल्ट की पीडीएफ सूची में सिर्फ अपना नाम देखा था और यह मान लिया कि उनका चयन हो गया है। उन्होंने रोल नंबर और अन्य विवरण का मिलान नहीं किया था। बाद में जब सूची में दिए गए रोल नंबर और बाकी जानकारी की जांच की गई तो स्पष्ट हो गया कि 113वीं रैंक किसी और उम्मीदवार की है।

दिल्ली की शिखा निकलीं असली अभ्यर्थी
जांच में सामने आया कि 113वीं रैंक की असली उम्मीदवार दिल्ली की रहने वाली शिखा हैं। जानकारी के मुताबिक वह फिलहाल हरियाणा के रोहतक जिले में खंड विकास एवं पंचायत अधिकारी (BDPO) के पद पर कार्यरत हैं। सच्चाई सामने आने के बाद बुलंदशहर की शिखा गौतम मीडिया के सामने आईं और अपनी गलती स्वीकार की। उन्होंने कहा कि रिजल्ट देखने के समय वह काफी उत्साहित थीं और जल्दबाजी में उन्होंने केवल नाम देखकर ही यह मान लिया कि उनका चयन हो गया है। शिखा के पिता प्रेमचंद ने भी स्वीकार किया कि परिवार ने बेटी की बात पर भरोसा कर लिया और बिना पूरी जांच किए यह खबर लोगों तक पहुंचा दी।

301वीं रैंक पर भी हो चुकी है ऐसी ही उलझन
UPSC के परिणाम को लेकर ऐसा भ्रम पहले भी सामने आ चुका है। सिविल सेवा परीक्षा 2025 में 301वीं रैंक को लेकर भी इसी तरह का विवाद पैदा हुआ था। मीडिया और सोशल मीडिया पर खबर फैल गई थी कि आकांक्षा सिंह नाम की दो उम्मीदवार 301वीं रैंक का दावा कर रही हैं। इनमें एक उम्मीदवार बिहार से और दूसरी उत्तर प्रदेश से बताई जा रही थी। बिहार की एक अभ्यर्थी ने सोशल मीडिया पर एक एडमिट कार्ड साझा किया, जिसमें रोल नंबर 0856794 बताया गया था। हालांकि बाद में दस्तावेजों की जांच में सामने आया कि उसी एडमिट कार्ड के बारकोड में अलग नंबर (0856569) दिखाई दे रहा था, जिससे संदेह पैदा हुआ।
UPSC को देना पड़ा आधिकारिक स्पष्टीकरण
इस भ्रम को खत्म करने के लिए संघ लोक सेवा आयोग को आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा। UPSC ने स्पष्ट किया कि 301वीं रैंक हासिल करने वाली उम्मीदवार उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले की आकांक्षा सिंह हैं। आयोग के अनुसार उनका रोल नंबर 0856794 है और उनके पिता का नाम रणजीत सिंह तथा माता का नाम नीलम सिंह है। वह गाजीपुर के अभैपुर गांव की निवासी हैं। जांच में यह भी सामने आया कि बिहार की जिस अभ्यर्थी ने दावा किया था, वह कथित तौर पर परीक्षा में शामिल ही नहीं हुई थीं और उनके दस्तावेज अमान्य पाए गए।

UPSC परिणाम के बाद क्यों फैलता है भ्रम?
विशेषज्ञों का मानना है कि UPSC जैसे बड़े परीक्षा परिणामों में अक्सर एक ही नाम के कई उम्मीदवार होते हैं। जब परिणाम की सूची सार्वजनिक होती है तो कुछ लोग केवल नाम देखकर ही अपना चयन मान लेते हैं, जबकि वास्तविक पुष्टि रोल नंबर, जन्मतिथि और अन्य विवरण से होती है। सोशल मीडिया के दौर में ऐसी जानकारी बहुत तेजी से फैल जाती है और कुछ ही समय में यह बड़ी खबर बन जाती है। यही कारण है कि प्रशासनिक अधिकारी और विशेषज्ञ हमेशा सलाह देते हैं कि परिणाम देखने के बाद आधिकारिक रिकॉर्ड और रोल नंबर का मिलान करना जरूरी है। बुलंदशहर की शिखा गौतम और 301वीं रैंक वाले आकांक्षा सिंह मामले ने यह दिखाया है कि UPSC जैसे बड़े परिणामों में नाम की समानता और अधूरी जांच किस तरह भ्रम पैदा कर सकती है। हालांकि दोनों मामलों में बाद में सच्चाई सामने आ गई और आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर सही उम्मीदवार की पहचान स्पष्ट हो गई। इन घटनाओं से यह भी स्पष्ट होता है कि किसी भी परीक्षा परिणाम को लेकर दावा करने से पहले रोल नंबर और आधिकारिक दस्तावेजों की पूरी तरह पुष्टि करना जरूरी है, ताकि अनावश्यक भ्रम और विवाद से बचा जा सके।




