ईरान युद्ध का भारत पर असर: होटल-रेस्टोरेंट से श्मशान तक गैस संकट, जानिए 5 बड़े प्रभाव

ईरान युद्ध का भारत पर असर: होटल-रेस्टोरेंट से श्मशान तक गैस संकट, जानिए 5 बड़े प्रभाव

द फ्रंट डेस्क: पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में बढ़ता तनाव अब केवल एक क्षेत्रीय मुद्दा नहीं रह गया है। ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच जारी संघर्ष ने वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डालना शुरू कर दिया है। पिछले दो हफ्तों से जारी इस टकराव में किसी भी पक्ष की ओर से पीछे हटने के संकेत नहीं मिल रहे हैं। इस अनिश्चितता का सबसे बड़ा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ा है, जो एक बार फिर 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। भारत के लिए यह स्थिति चिंताजनक है क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल और गैस की कीमतों में होने वाला कोई भी उतार-चढ़ाव सीधे भारत की अर्थव्यवस्था और आम लोगों के जीवन पर असर डालता है। यही कारण है कि इस युद्ध का प्रभाव अब धीरे-धीरे देश के कई क्षेत्रों में दिखाई देने लगा है।

ऊर्जा संकट और उद्योगों पर खतरा

मिडिल ईस्ट में स्थित स्ट्रेट ऑफ होर्मुज वैश्विक तेल और गैस सप्लाई का सबसे महत्वपूर्ण रास्ता माना जाता है। दुनिया के बड़े हिस्से में कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति इसी मार्ग से होती है। इस क्षेत्र में बढ़ते तनाव और संभावित हमलों के खतरे के कारण सप्लाई चेन प्रभावित होने लगी है। अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता और बढ़ सकती है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 80 प्रतिशत तेल और गैस आयात करता है। ऐसे में सप्लाई में थोड़ी भी रुकावट देश के कई उद्योगों के लिए चुनौती बन सकती है। गैस की कमी का असर अब फर्टिलाइजर प्लांट, टाइल्स और सिरेमिक फैक्ट्रियों, स्टील और केमिकल उद्योगों जैसे कई सेक्टरों पर पड़ने लगा है। उत्पादन लागत बढ़ने के कारण कई उद्योगों को उत्पादन कम करना पड़ सकता है या वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की तलाश करनी पड़ सकती है। रेस्टोरेंट इंडस्ट्री भी इस संकट से अछूती नहीं रही है। नेशनल रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने अपने सदस्यों को सलाह दी है कि वे मेनू को सीमित करें और जहां संभव हो गैस की जगह बिजली से चलने वाले उपकरणों का उपयोग बढ़ाएं, ताकि संचालन जारी रखा जा सके और गैस की खपत कम की जा सके।

अंतिम संस्कार की व्यवस्था पर भी असर

गैस की कमी का असर अब श्मशान घाटों तक पहुंच गया है, जो इस संकट की गंभीरता को दिखाता है। कई शहरों में LPG आधारित गैस शवदाह गृह गैस की कमी के कारण प्रभावित होने लगे हैं और कुछ जगहों पर इन्हें अस्थायी रूप से बंद भी करना पड़ा है। इससे अंतिम संस्कार की व्यवस्थाओं पर भी असर पड़ने लगा है। ऐसी स्थिति में कई परिवारों को पारंपरिक लकड़ी आधारित अंतिम संस्कार की व्यवस्था का सहारा लेना पड़ रहा है। हालांकि यह व्यवस्था पहले से मौजूद है, लेकिन गैस आधारित शवदाह गृह तेज, सुविधाजनक और पर्यावरण के लिहाज से बेहतर माने जाते हैं। गैस की कमी के कारण इस आधुनिक व्यवस्था का उपयोग कम होना पड़ रहा है। इसके अलावा लकड़ी आधारित अंतिम संस्कार में अधिक समय और संसाधनों की जरूरत होती है, जिससे कई जगहों पर व्यवस्थागत दबाव भी बढ़ सकता है।

हवाई यात्रा महंगी और उड़ानें प्रभावित

मिडिल ईस्ट के ऊपर से गुजरने वाली अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए जोखिम बढ़ गया है। युद्ध और सैन्य गतिविधियों के कारण कई एयरलाइंस ने अपने फ्लाइट रूट बदल दिए हैं या कुछ उड़ानों को अस्थायी रूप से रद्द कर दिया है। इससे वैश्विक विमानन उद्योग पर भी असर पड़ रहा है। इस स्थिति के कारण विमानन कंपनियों का बीमा प्रीमियम काफी बढ़ गया है, क्योंकि युद्ध क्षेत्र के ऊपर से उड़ान भरना जोखिम भरा माना जाता है। इसके साथ ही एविएशन टरबाइन फ्यूल (ATF) की कीमतों में तेजी आने से एयरलाइंस की लागत भी बढ़ गई है। इन दोनों कारणों का सीधा असर यात्रियों पर पड़ रहा है। कई रूट्स पर हवाई किराए बढ़ने लगे हैं और अंतरराष्ट्रीय यात्रा पहले की तुलना में महंगी होती जा रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक युद्ध के कारण वैश्विक स्तर पर अब तक करीब 46,000 उड़ानें रद्द हो चुकी हैं, जिससे पर्यटन और अंतरराष्ट्रीय व्यापार भी प्रभावित हुआ है।

सोना-चांदी की कीमतों में अलग रुझान

आमतौर पर जब दुनिया में युद्ध या आर्थिक संकट की स्थिति बनती है, तो निवेशक सुरक्षित विकल्प के रूप में सोने में निवेश बढ़ाते हैं। इससे सोने की कीमतों में तेजी देखने को मिलती है। लेकिन इस बार बाजार में थोड़ी अलग स्थिति दिखाई दे रही है। तेल की कीमतों में तेजी के कारण वैश्विक महंगाई बढ़ने की आशंका है। ऐसे में अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में कटौती की संभावना कम हो गई है। जब ब्याज दरें ऊंची रहती हैं, तो निवेशक डॉलर में निवेश को प्राथमिकता देते हैं। इसी वजह से डॉलर मजबूत हो रहा है और इसका असर सोने और चांदी की कीमतों पर पड़ रहा है। मजबूत डॉलर के दबाव के कारण फिलहाल सोने और चांदी की कीमतों में गिरावट देखी जा रही है। वित्तीय संस्थाओं का मानना है कि जब तक ब्याज दरों को लेकर स्पष्ट संकेत नहीं मिलते, तब तक कीमती धातुओं के बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है।

भारत की अर्थव्यवस्था पर संभावित असर

भारत ने वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य तय किया है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए देश को हर साल करीब 8 से 11 प्रतिशत की जीडीपी वृद्धि की आवश्यकता होगी। लेकिन वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता इस लक्ष्य के लिए चुनौती बन सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रहती हैं, तो इसका असर भारत की आर्थिक वृद्धि दर पर पड़ सकता है। ऊर्जा की लागत बढ़ने से उत्पादन खर्च बढ़ेगा, जिससे महंगाई और व्यापार दोनों प्रभावित हो सकते हैं। अनुमान है कि ऐसी स्थिति में भारत की GDP ग्रोथ में करीब 0.60 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है। भले ही यह आंकड़ा छोटा लगे, लेकिन इसका असर रोजगार, निवेश और औद्योगिक गतिविधियों पर पड़ सकता है। इसलिए मिडिल ईस्ट में जारी यह संघर्ष भारत की आर्थिक योजनाओं और विकास की रफ्तार के लिए भी चिंता का विषय बन गया है।

Share post:

Popular

More like this
Related

सब कुछ ठीक है तो लोग हड़ताल क्यों कर रहे? यूपी में रसोई गैस संकट और सरकार का हंटर

द फ्रंट डेस्क: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ...