मध्य-पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और खासतौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास की स्थिति ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए कितना सुरक्षित है। पेट्रोल-डीजल से लेकर रसोई गैस तक, देश की रोजमर्रा की जिंदगी तेल और गैस पर टिकी हुई है। लेकिन हकीकत यह है कि भारत इन जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर दूसरे देशों पर निर्भर है। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाली हर हलचल का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जेब पर पड़ता है।
कच्चा तेल: सबसे बड़ी निर्भरता
भारत की ऊर्जा जरूरतों में कच्चे तेल की भूमिका सबसे अहम है, और इसी क्षेत्र में निर्भरता सबसे ज्यादा दिखाई देती है। 2024-25 के आंकड़ों के अनुसार, भारत अपनी कुल जरूरत का लगभग 85% से 88% कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। यह आंकड़ा अपने आप में बताता है कि घरेलू उत्पादन अभी भी देश की मांग के मुकाबले काफी कम है।
वित्त वर्ष 2023-24 में भारत ने करीब 232.5 मिलियन मीट्रिक टन कच्चे तेल का आयात किया, जो दुनिया के बड़े आयातकों में उसकी स्थिति को मजबूत करता है। देश की दैनिक खपत लगभग 55 लाख बैरल है, जो तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और बढ़ते परिवहन सेक्टर का संकेत देती है। आपूर्ति के लिहाज से भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपने स्रोतों में बदलाव भी किया है। रूस से आयात में तेजी आई है, जो अब लगभग 37-40% तक पहुंच गया है। इसके अलावा इराक (करीब 21%), सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात भी प्रमुख आपूर्तिकर्ता बने हुए हैं। यह विविधता एक तरफ जहां आपूर्ति को संतुलित करती है, वहीं दूसरी तरफ यह भी दिखाती है कि भारत अभी भी वैश्विक बाजार के उतार-चढ़ाव से पूरी तरह सुरक्षित नहीं है।
प्राकृतिक गैस: आधी जरूरत आयात से पूरी
प्राकृतिक गैस को स्वच्छ ईंधन के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है, लेकिन इस क्षेत्र में भी भारत आत्मनिर्भर नहीं बन पाया है। देश की कुल खपत लगभग 189 मिलियन घन मीटर प्रतिदिन है, जिसमें से आधे से ज्यादा हिस्से के लिए आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। घरेलू उत्पादन करीब 97.5 मिलियन घन मीटर प्रतिदिन है, जो कुल मांग का केवल एक हिस्सा ही पूरा कर पाता है। बाकी की जरूरत तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) के आयात से पूरी की जाती है। इस मामले में कतर भारत का सबसे बड़ा साझेदार है, जहां से करीब 47-50% LNG आयात होता है। इसके अलावा अमेरिका, UAE और ओमान भी महत्वपूर्ण स्रोत हैं। हालांकि, LNG आयात महंगा पड़ता है और इसकी कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार के हिसाब से बदलती रहती हैं, जिससे भारत की ऊर्जा लागत पर सीधा असर पड़ता है।
एलपीजी: रसोई गैस भी विदेशी सहारे
भारत के हर घर तक पहुंच चुकी एलपीजी यानी रसोई गैस भी बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। देश अपनी कुल एलपीजी खपत का लगभग 60% हिस्सा विदेशों से मंगाता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस आयात का करीब 90% हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आता है, जो दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री मार्गों में से एक है। अगर इस रास्ते में किसी भी तरह की रुकावट आती है, तो इसका असर सीधे भारत की रसोई तक पहुंच सकता है। उज्ज्वला योजना जैसी सरकारी पहलों के कारण एलपीजी की मांग लगातार बढ़ी है, जिससे आयात पर निर्भरता भी और बढ़ गई है। ऐसे में यह क्षेत्र भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील बन जाता है।
क्यों बढ़ती है चिंता?
भारत की ऊर्जा जरूरतों में आयात की इतनी बड़ी हिस्सेदारी उसे वैश्विक संकटों के प्रति बेहद संवेदनशील बना देती है। जब भी मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ता है, या तेल सप्लाई में बाधा आती है, तो इसका असर सीधे भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दिखने लगता है। हाल के दिनों में प्रीमियम पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी इसका एक उदाहरण है। इसके अलावा, समुद्री व्यापार मार्गों पर बढ़ते खतरे से शिपिंग लागत भी बढ़ती है, जो अंततः महंगाई को बढ़ाने का काम करती है। ऊर्जा केवल ईंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उद्योग, परिवहन, बिजली उत्पादन और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी हुई है। ऐसे में ऊर्जा आपूर्ति में किसी भी तरह की अनिश्चितता पूरे आर्थिक ढांचे को प्रभावित कर सकती है। 2024-25 के आंकड़े साफ तौर पर दिखाते हैं कि भारत अभी भी अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर दूसरे देशों पर निर्भर है। कच्चे तेल से लेकर गैस और एलपीजी तक, हर क्षेत्र में आयात की भूमिका प्रमुख बनी हुई है।
ऐसे में आने वाले समय में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा को कैसे मजबूत करे। इसके लिए घरेलू उत्पादन बढ़ाना, नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देना और आयात के स्रोतों में विविधता लाना बेहद जरूरी होगा। जब तक यह संतुलन नहीं बनता, तब तक वैश्विक स्तर पर होने वाली हर हलचल भारत की अर्थव्यवस्था और आम जनता की जेब पर असर डालती रहेगी।




