ब्रज से बनारस तक: देश के हर कोने में होली के अलग-अलग रंग

ब्रज से बनारस तक: देश के हर कोने में होली के अलग-अलग रंग

द फ्रंट डेस्क: फाल्गुन पूर्णिमा को मनाया जाने वाला होली का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। साल 2026 में होलिका दहन 2 मार्च को होगा, जबकि 4 मार्च को रंगों की होली खेली जाएगी। होली से आठ दिन पहले होलाष्टक शुरू हो जाते हैं, जिनमें शुभ कार्यों से परहेज किया जाता है। होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विविधता का जीवंत उत्सव है। देश के अलग-अलग हिस्सों में इसे अनोखे अंदाज और परंपराओं के साथ मनाया जाता है। कहीं लाठियां चलती हैं, कहीं फूल बरसते हैं, तो कहीं शौर्य और भक्ति का संगम देखने को मिलता है।

ब्रज की लट्ठमार होली: परंपरा और प्रेम का रंग

उत्तर प्रदेश के ब्रज क्षेत्र बरसाना और नंदगांव की लट्ठमार होली दुनियाभर में प्रसिद्ध है। यह परंपरा राधा-कृष्ण की कथाओं से जुड़ी मानी जाती है। बरसाना में महिलाएं पुरुषों पर लाठियां बरसाती हैं और पुरुष ढाल से बचाव करते हैं। ढोल, मंजीरे और फाग गीतों के बीच कई दिनों तक चलने वाला यह उत्सव हजारों पर्यटकों को आकर्षित करता है।

बनारस की होली: भक्ति, मस्ती और परंपरा का संगम

वाराणसी (बनारस) की होली भी अपने अनोखे अंदाज के लिए जानी जाती है। यहां होली केवल रंगों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि भक्ति और उत्सव का संगम बन जाती है। काशी के घाटों, खासकर दशाश्वमेध और अस्सी घाट पर लोग गुलाल उड़ाते हुए भजन-कीर्तन और लोकगीतों के साथ जश्न मनाते हैं। बनारस की होली में ठंडाई और भांग का खास महत्व होता है। यहां की ‘मसान होली’ भी चर्चा में रहती है, जो महाश्मशान मणिकर्णिका घाट के आसपास खेली जाती है। यह परंपरा जीवन और मृत्यु के दर्शन से जुड़ी मानी जाती है और काशी की आध्यात्मिक पहचान को दर्शाती है। बनारस की होली में भक्ति, फक्कड़पन और सांस्कृतिक रंग एक साथ देखने को मिलते हैं।

बिहार का फगुआ: लोकगीतों और मस्ती का संगम

पटना और आसपास के इलाकों में होली को ‘फगुआ’ कहा जाता है। यहां होली सिर्फ रंग खेलने का दिन नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति का बड़ा उत्सव होती है। रंग-गुलाल के साथ भोजपुरी गीतों की धूम रहती है। ढोलक, झाल और मंजीरे की थाप पर फगुआ गीत गाए जाते हैं, जिनमें प्रेम, हंसी-मजाक और सामाजिक व्यंग्य का रंग भी घुला होता है। कुछ ग्रामीण इलाकों में कीचड़ से होली खेलने की परंपरा भी देखने को मिलती है। भांग और ठंडाई के साथ लोग टोली बनाकर घर-घर जाते हैं और गीत गाते हैं। यह होली रिश्तों को मजबूत करने और पुराने गिले-शिकवे भूलने का अवसर मानी जाती है।

बंगाल की डोल जत्रा: भक्ति और बसंत का उत्सव

पश्चिम बंगाल में होली को ‘डोल पूर्णिमा’ या ‘डोल जत्रा’ के नाम से मनाया जाता है। इस दिन राधा-कृष्ण की शोभायात्रा निकाली जाती है और भक्तजन अबीर-गुलाल अर्पित करते हैं। शांतिनिकेतन में ‘बसंत उत्सव’ विशेष आकर्षण होता है, जिसकी शुरुआत गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने की थी। छात्र-छात्राएं केसरिया या पीले वस्त्र पहनकर गीत, नृत्य और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां देते हैं। यहां होली में शोर-शराबे की बजाय कला, संगीत और सौंदर्य का रंग अधिक दिखाई देता है।

पंजाब का होला मोहल्ला: शौर्य और पराक्रम की झलक

पंजाब के आनंदपुर साहिब में होली के अगले दिन ‘होला मोहल्ला’ मनाया जाता है। इसकी शुरुआत गुरु गोबिंद सिंह जी ने की थी। यह पर्व रंगों से अधिक वीरता और युद्ध कौशल के प्रदर्शन के लिए जाना जाता है। तलवारबाजी, घुड़सवारी, नकली युद्धाभ्यास और मार्शल आर्ट के प्रदर्शन यहां के मुख्य आकर्षण होते हैं। यह तीन दिनों तक चलने वाला उत्सव साहस, अनुशासन और भाईचारे का संदेश देता है।

दक्षिण भारत की शांत होली

दक्षिण भारत में होली उत्तर भारत जितनी धूमधाम से नहीं मनाई जाती, लेकिन इसकी अपनी विशेष पहचान है। तमिलनाडु में इसे ‘कामदहनम’ कहा जाता है, जो कामदेव की कथा से जुड़ा है। केरल में मलयाली समुदाय इसे सीमित रूप से मनाता है, जबकि तमिल समुदाय ‘मंगलकुली’ के रूप में रंगों का उत्सव मनाता है। हैदराबाद जैसे शहरों में दो दिनों तक रंगों की रौनक रहती है, जहां उत्तर और दक्षिण भारतीय संस्कृति का संगम देखने को मिलता है।

उत्तराखंड की संगीतमय होली

अल्मोड़ा में होली संगीत के साथ मनाई जाती है। यहां ‘बैठकी होली’ और ‘खड़ी होली’ की परंपरा है। बैठकी होली में लोग बैठकर शास्त्रीय रागों पर आधारित गीत गाते हैं, जबकि खड़ी होली में नाचते-गाते हुए गुलाल लगाया जाता है। यह उत्सव कई दिनों तक चलता है और घर-घर जाकर होली गीत गाने की परंपरा आज भी जीवित है। यहां की होली में सांस्कृतिक गहराई और मधुर संगीत का अनोखा संगम देखने को मिलता है।

देशभर में होली के रंग और परंपराएं भले ही अलग-अलग हों, लेकिन इस पर्व का संदेश एक ही है—खुशी, भाईचारा और मेल-मिलाप। कहीं लोकगीत गूंजते हैं, कहीं शौर्य का प्रदर्शन होता है, तो कहीं भक्ति और कला का संगम दिखाई देता है। यही विविधता होली को भारत का सबसे जीवंत और अनोखा त्योहार बनाती है। अलग-अलग परंपराओं के बावजूद हर जगह एक समान भावना है—रिश्तों में रंग भरने और मिलकर जश्न मनाने की।

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