द फ्रंट डेस्क: उत्तर प्रदेश की राजधानी में स्थित University of Lucknow एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। इस बार विवाद की वजह विश्वविद्यालय परिसर में नमाज अदा किए जाने को लेकर पैदा हुआ टकराव है। 22 फरवरी को लाल बारादरी परिसर में नमाज पढ़े जाने के बाद छात्रों के दो समूह आमने-सामने आ गए। एक ओर कुछ छात्रों ने इसे आपसी सौहार्द और धार्मिक स्वतंत्रता का मामला बताया, तो दूसरी ओर विरोध करने वाले छात्रों ने विश्वविद्यालय परिसर को “धार्मिक रंग” दिए जाने का आरोप लगाया। घटना के बाद परिसर में नारेबाजी हुई और स्थिति तनावपूर्ण हो गई। एहतियात के तौर पर प्रशासन ने पुलिस बल तैनात कर दिया। फिलहाल मामला प्रशासनिक समीक्षा के अधीन है, लेकिन इसने कैंपस में धार्मिक गतिविधियों की सीमा और विश्वविद्यालयों की भूमिका पर नई बहस छेड़ दी है।
कैसे शुरू हुआ विवाद?
बताया जा रहा है कि 22 फरवरी को विश्वविद्यालय परिसर स्थित लाल बारादरी में कुछ मुस्लिम छात्रों ने नमाज अदा की। इसका एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें कुछ हिंदू छात्र मानव श्रृंखला बनाकर नमाज के दौरान सहयोग करते दिखाई दिए। कई लोगों ने इसे सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल बताया। हालांकि अगले ही दिन एक अन्य छात्र संगठन ने इसका विरोध शुरू कर दिया। उनका कहना था कि विश्वविद्यालय परिसर में किसी भी प्रकार की धार्मिक गतिविधि की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। विरोध के दौरान ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाए गए। छात्रों का आरोप था कि परिसर को धार्मिक गतिविधियों का मंच बनाया जा रहा है, जो शैक्षणिक माहौल के अनुकूल नहीं है। विरोध के बीच दोनों पक्षों में तीखी बहस हुई और माहौल गरमा गया। प्रशासन ने तुरंत हस्तक्षेप कर स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश की।

लाल बारादरी का ऐतिहासिक महत्व और रेनोवेशन का मुद्दा
लाल बारादरी एक ऐतिहासिक संरचना है, जिसका निर्माण नवाब नसीरुद्दीन हैदर के समय हुआ था। यह इमारत भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित मानी जाती है। वर्तमान में यहां रेनोवेशन का कार्य चल रहा है और परिसर के बाहर सूचना बोर्ड भी लगाया गया है। बताया गया कि रेनोवेशन के बावजूद कुछ छात्र नमाज अदा करने पहुंचे थे। इसके बाद प्रशासन ने परिसर के बाहर ताला लगा दिया और बैरिकेटिंग कर दी। जब छात्रों को भीतर जाने से रोका गया तो उन्होंने बाहर बैठकर नमाज पढ़ी और वहीं रोजा भी खोला। इसी दौरान कुछ हिंदू छात्रों ने बैरिकेटिंग हटाकर मानव श्रृंखला बनाई ताकि नमाज शांतिपूर्वक पूरी हो सके। यह दृश्य सोशल मीडिया पर तेजी से फैल गया और अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आईं। लेकिन इसके अगले ही दिन विरोध का नया दौर शुरू हो गया।

दोनों पक्षों की दलीलें क्या हैं?
विरोध कर रहे छात्रों का कहना है कि विश्वविद्यालय एक शैक्षणिक संस्था है और यहां धार्मिक गतिविधियों की अनुमति देना उचित नहीं है। उनका तर्क है कि यदि किसी एक धर्म के आयोजन की अनुमति दी जाती है, तो भविष्य में अन्य धार्मिक कार्यक्रमों को लेकर भी विवाद खड़े हो सकते हैं। वे चाहते हैं कि प्रशासन स्पष्ट नीति बनाए। दूसरी ओर, नमाज अदा करने वाले छात्रों का कहना है कि उन्होंने शांतिपूर्वक अपनी धार्मिक आस्था का पालन किया। उनका दावा है कि परिसर में कोई स्थायी धार्मिक ढांचा नहीं बनाया गया और न ही किसी नियम का उल्लंघन किया गया। उनके मुताबिक, विश्वविद्यालय परिसर सभी छात्रों के लिए समान रूप से खुला है और व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान होना चाहिए। यह विवाद केवल एक धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सवाल भी उठा रहा है कि विश्वविद्यालय परिसर में व्यक्तिगत आस्था और संस्थागत मर्यादा के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए।

प्रशासन की कार्रवाई और आगे की संभावनाएं
स्थिति को देखते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन ने भारी पुलिस बल तैनात किया और छात्रों से शांति बनाए रखने की अपील की। लाल बारादरी परिसर को अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया है। प्रशासन का कहना है कि शैक्षणिक वातावरण को बनाए रखना प्राथमिकता है और किसी भी प्रकार की अव्यवस्था बर्दाश्त नहीं की जाएगी। फिलहाल मामले की समीक्षा की जा रही है। संभावना है कि प्रशासन विश्वविद्यालय परिसर में धार्मिक गतिविधियों को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करे, ताकि भविष्य में इस तरह के विवादों से बचा जा सके।
यह घटना केवल लखनऊ यूनिवर्सिटी तक सीमित नहीं है। देश के कई विश्वविद्यालयों में समय-समय पर धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों को लेकर बहस होती रही है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन किस तरह संतुलन कायम करता है—ताकि न तो धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित हो और न ही शैक्षणिक वातावरण पर प्रतिकूल असर पड़े। फिलहाल परिसर में स्थिति नियंत्रण में बताई जा रही है, लेकिन यह मुद्दा आने वाले दिनों में छात्र राजनीति और सार्वजनिक बहस का हिस्सा बना रह सकता है।




