28जनवरी 2021

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने कर्नाटक के बेलगाम को अपने प्रदेश में मिलाने वाला बयान देकर दशकों पुराने इस विवाद को फिर से सुलगा दिया है। बेलगाम या बेलगावी जिला अभी कर्नाटक का हिस्सा है, जिसपर महाराष्ट्र भी अपना दावा जताता है। लेकिन, बीते 18 जनवरी को कर्नाटक के मराठी-भाषा बहुल इलाकों को महाराष्ट्र में शामिल करने की बात कहकर उद्धव ठाकरे ने इसपर नया सियासी जंग छेड़ दिया है। वैसे यह कोई पहली बार नहीं हुआ है, जो शिवसेना ने इस सीमा विवाद को भाषाई आधार पर तूल देकर राजनीति की रोटी सेंकने की कोशिश की है। आइए जानते हैं कि यह पूरा विवाद क्या है, इसपर पहले किस तरह की राजनीति हो चुकी है और अब महाराष्ट्र के सीएम के बयान के बाद कर्नाटक की राजनीति किस तरह की करवट ले रही है। क्योंकि, कन्नड़ भाषियों ने उद्धव का विरोध करना भी शुरू कर दिया है।

उद्धव ठाकरे के बयान से फिर सुलगा बेलगाम सीमा विवाद

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से पहले महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार भी पिछले साल कर्नाटक के बेलगाम, करवार और निपाणी इलाके को महाराष्ट्र में शामिल करने की मांग कर चुके हैं। तब उन्होंने इसे शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे का सपना बताया था। यही नहीं बुधवार को सीएम ठाकरे ने यहां तक कह दिया कि उस इलाके में मराठी भाषियों पर अत्याचार हो रहे हैं, जिसे लेकर महाराष्ट्र सरकार सुप्रीम कोर्ट में जाएगी और उससे अपील करेगी कि तब तक इस क्षेत्र को केंद्र शासित प्रदेश घोषित कर दिया जाए। गुरुवार को इसपर कर्नाटक के डिप्टी सीएम लक्ष्मण सवादी ने पलटवार किया है। उन्होंने कहा है कि मुंबई को कर्नाटक में शामिल किया जाना चाहिए और ‘जबतक यह होता है, मैं केंद्र से आग्रह करूंगा कि मुंबई को केंद्र शासित प्रदेश घोषित किया जाए।’ गौरतलब है कि इस समय महाराष्ट्र में शिवसेना की अगुवाई वाली सरकार है और कर्नाटक में भाजपा की सरकार है।

क्या है बेलगाम विवाद का इतिहास

महाराष्ट्र की कई सरकारें कर्नाटक के बेलगाम जिले पर अपना दावा करती रही हैं और इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक मामला भी लंबित है। लेकिन, तथ्यों पर जाएं तो बेलगाम मूलरूप से पूर्ववर्ती बॉम्बे प्रेसिडेंसी का हिस्सा था, जो कि बहु-भाषी प्रांत था। कर्नाटक के विजयापुरा, बेलगावी, धारवाड़ और उत्तर-कन्नड़ जिले बॉम्बे प्रेसिडेंसी के हिस्से थे। 1947 में आजादी के बाद बेलगाम बॉम्बे प्रदेश के तहत आया। 1881 की जनगणना के मुताबिक बेलगाम में 64.39 फीसदी लोग कन्नड़-भाषी थे और 26.04 फीसदी लोग मराठी। लेकिन, 1940 के दशक में बेलगाम पर मराठी-भाषी राजनीतिज्ञ प्रभावी हो गए और उन्होंने गुजारिश की कि उनके जिले को प्रस्तावित संयुक्त महाराष्ट्र प्रदेश (Samyukta Maharashtra state) में शामिल किया जाए। लेकिन, राज्य पुनर्गठन कानून, 1956 (States Reorganisation Act of 1956) के तहत उनकी मांग खारिज कर दी गई और बेलगाम के अलावा बॉम्बे प्रांत (Bombay State) के 10 तालुकाओं को मैसूर राज्य (Mysore State) का हिस्सा माना गया, जिसका नाम 1997 में बदलकर कर्नाटक हो गया। इस कानून के तहत राज्यों का बंटवारा भाषा और प्रशासनिक आधार पर किया गया है।

महाजन आयोग की रिपोर्ट

जब राज्य पुनर्गठन कानून, 1956 के तहत मराठी नेताओं की मांग खारिज हो गई तो तत्कालीन बॉम्बे सरकार ने केंद्र के सामने इसको लेकर अपना विरोध जताना शुरू कर दिया। 10 साल बाद 1966 में इस विवाद के निपटारे के लिए जस्टिस मेहर चंद महाजन की अगुवाई वाला महाजन आयोग गठित किया गया। इस आयोग ने एक साल बाद यानि 1967 में अपनी रिपोर्ट जारी की, जिसमें विवादित क्षेत्र में आने वाले 264 गांव महाराष्ट्र को और 247 गांव कर्नाटक को दिए गए। हालांकि, इस आयोग ने भी बेलगाम पर कर्नाटक के दावे को हरी झंडी दे दी। महाराष्ट्र ने इस रिपोर्ट को मानने से इनकार कर दिया, जबकि कर्नाटक ने यथास्थिति बनाए रखने की मांग की।

अभी भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है मामला

2006 में यह विवाद फिर से तब खूब सुर्खियों में आया था, जब इसको लेकर महाराष्ट्र सरकार सुप्रीम कोर्ट में चली गई और उसने बेलगाम शहर पर दावा जताते हुए याचिका दायर कर दी। महाराष्ट्र सरकार की याचिका में इसके लिए दलील दी गई कि ‘इन दिनों कर्नाटक में रहने वाले मराठी भाषी लोगों के मन में असुरक्षा की भावना पैदा हो गई है।’ लेकिन, तथ्य ये है कि आज की तारीख में भी बेलगाम शहर के साथ ही पूरा बेलगाम जिला कर्नाटक का ही हिस्सा है।