नई दिल्ली, 31 मई 2021

सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को मीडिया में दिखाई गई एक फुटेज को लेकर सरकार पर बहुत ही व्यंगात्मक टिप्पणी की है। रविवार को उत्तर प्रदेश में एक पुल से एक शव को राप्ती नदी में फेंके जाने वाले वीडियो को लेकर सुप्रीम कोर्ट के सीनियर जज जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने बहुत ही तीखा तंज किया है। उन्होंने सवाल किया कि क्या उस फुटेज को दिखाने के लिए न्यूज चैलन के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा किया गया। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कोविड-19 से संबंधित केस की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की है। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच इस मामले की स्वत: संज्ञान लेकर सुनवाई कर रही है।

सुप्रीम कोर्ट ने नदी में शव फेंके जाने पर की व्यंगात्मक टिप्पणी

सोमवार को सुनवाई के दौरान जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, ‘कल एक न्यूज रिपोर्ट में एक शव को नदी में फेंकते हुए दिखाया गया था। मुझे नहीं पता कि क्या अभी तक उस न्यूज चैनल के खिलाफ देशद्रोह का मुदकमा दर्ज कर लिया गया है….’ ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने कोविड से संबंधित मामलों में सोशल मीडिया पर मदद मांगने वालों के खिलाफ सरकारों के रवैए की पहले भी आलोचना की है। 30 अप्रैल को सुनवाई के दौरान अदालत ने साफ किया था कि सोशल मीडिया पर महामारी से संबंधित अपनी शिकायतें बयां करने वाले नागरिकों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जा सकती। जस्टिस चंद्रचूड़ की अगुवाई वाले बेंच ने कहा था कि अधिकारियों की ओर से होने वाली ऐसी कार्रवाई को अदालत का अवमानना माना जाएगा। इस बेंच में उनके अलावा जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस रवींद्र भट भी शामिल हैं।

आंध्र प्रदेश के दो टीवी चैनलों की दी है राहत

दरअसल, उत्तर प्रदेश सरकार ने पहले कोविड-19 को लेकर मदद के नाम पर सोशल मीडिया पर झूठी अपील करने वालों के खिलाफ सख्त सिविल और क्रिमिनल कार्रवाई करने को कहा था, जिसपर अदालत ने ऐसी किसी भी कार्रवाई के खिलाफ हिदायत दी थी। सोमवार की सुनवाई के दौरान अदालत ने मीडिया और फ्रीडम ऑफ स्पीच को लेकर आईपीसी की धारा 124ए की विस्तृत व्याख्या की जरूरत बताई, जिसके तहत देशद्रोह को अपराध माना गया है। इससे पहले ये अदालत आंध्र प्रदेश के दो न्यूज चैनलों टीवी5 और एबीएन न्यूज के खिलाफ आंध्र प्रदेश पुलिस की ओर से दायर देशद्रोह के मामले से सुरक्षा दे चुकी है। इन चैनलों ने वाईएसआर कांग्रेस के नेता की ओर से कोविड मैनेजमेंट को लेकर राज्य सरकार के खिलाफ की गई ‘आपत्तिजनक भाषण’ दिखाया था। इसपर जजों ने ये भी कहा था कि ‘यही समय है कि हम देशद्रोह की सीमा तय करें।’

देशद्रोह कानून पर केंद्र से जवाब मांग चुकी है अदालत

पिछले 1 मार्च को अदालत ने इसी तरह श्रीनगर से सांसद और नेशनल कांफ्रेंस के नेता फारूक अब्दुल्ला के खिलाफ एक याचिका ये कहकर खारिज कर दिया था कि सरकार की राय से अलग राय जाहिर करना ‘देशद्रोह’ नहीं कहला सकता। दरअसल, अब्दुल्ला ने आर्टिकल 370 के मुद्दे पर चीन और पाकिस्तान से कथित तौर पर मदद मांगने की बात कही थी। अदालत ने इस मामले में याचिकाकर्ता पर 50,000 रुपये का जुर्माना भी लगा दिया था। बता दें कि देशद्रोह कानून की वैद्यता को चुनौती देने वाली एक पीआईएल पर बीते 1 मई को अदालत ने केंद्र सरकार से जवाब भी मांगा है। यह याचिका मणिपुर और छत्तीसगढ़ के दो पत्रकारों ने डाली है, जिसमें कहा गया है यह कानून फ्रीडम ऑफ स्पीच के प्रावधानों का उल्लंघन है।