द फ्रंट डेस्क: बिहार सरकार की सोलर क्रॉप ड्रायर योजना इन दिनों कीमत और सब्सिडी को लेकर सवालों के घेरे में है। योजना के तहत 100 किलोग्राम क्षमता वाले सोलर क्रॉप ड्रायर की अनुमानित लागत ₹3.50 लाख तय की गई है, जिस पर किसानों को अधिकतम ₹1.40 लाख का अनुदान दिया जाना है। कृषि विभाग के मुताबिक इसका उद्देश्य फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करना और किसानों को बेहतर कीमत दिलाना है। हालांकि, सामाजिक कार्यकर्ता और रोजगार मामलों के जानकार संजीव श्रीवास्तव ने वरिष्ठ पत्रकार राणा यशवंत के डिजिटल शो द फ्रंट में इस लागत को लेकर सवाल उठाए हैं। उनका दावा है कि बाजार में इसी क्षमता के कुछ सोलर ड्रायर इससे काफी कम कीमत पर उपलब्ध हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि सरकारी योजना में तय यूनिट कॉस्ट कैसे निर्धारित हुई और इसमें कौन-कौन से उपकरण व सेवाएं शामिल हैं?
क्या है बिहार की सोलर क्रॉप ड्रायर योजना?
बिहार के उद्यान निदेशालय की ओर से शुरू की गई योजना में किसानों को सोलर ऊर्जा से चलने वाला क्रॉप ड्रायर उपलब्ध कराने की बात कही गई है। सरकार के मुताबिक 100 किलोग्राम क्षमता वाले ड्रायर की अनुमानित लागत ₹3.50 लाख है और इस पर अधिकतम ₹1.40 लाख यानी 40 फीसदी तक अनुदान दिया जाएगा। सरकार का तर्क है कि सोलर ड्रायर की मदद से फलों, सब्जियों और दूसरी कृषि उपज को नियंत्रित परिस्थितियों में सुखाया जा सकेगा। इससे खुले में सुखाने के दौरान होने वाले धूल, नमी और कीटों से नुकसान को कम करने में मदद मिल सकती है। कृषि विभाग के अनुसार इच्छुक किसान उद्यान निदेशालय के पोर्टल के माध्यम से आवेदन कर सकते हैं।
₹3.50 लाख की कीमत पर क्यों उठ रहे सवाल?
विवाद की मुख्य वजह सरकारी यूनिट कॉस्ट और बाजार में उपलब्ध उपकरणों की कीमत के बीच कथित अंतर है। संजीव श्रीवास्तव का दावा है कि बाजार में 100 किलो क्षमता वाले कुछ ड्रायर करीब ₹1 लाख से ₹1.20 लाख के आसपास उपलब्ध हैं। ऑनलाइन बाजार की मौजूदा लिस्टिंग में भी 100 किलो क्षमता वाले कुछ ड्रायर करीब ₹85 हजार और एक सोलर डिहाइड्रेटर करीब ₹1.21 लाख में सूचीबद्ध दिखाई देते हैं। हालांकि इन उत्पादों के स्पेसिफिकेशन और बिहार योजना के तहत दिए जाने वाले पूरे सिस्टम की तुलना अलग-अलग करनी होगी। यही वह बिंदु है जहां से सवाल उठता है कि क्या सरकारी योजना में जिस ₹3.50 लाख की यूनिट कॉस्ट को आधार बनाया गया है, उसमें केवल ड्रायर की कीमत शामिल है या इंस्टॉलेशन, सोलर सिस्टम, कंट्रोल यूनिट, स्ट्रक्चर, ट्रेनिंग, वारंटी और मेंटेनेंस जैसी सेवाएं भी शामिल हैं? इसका स्पष्ट जवाब मिलने के बाद ही बाजार कीमत और सरकारी लागत की वास्तविक तुलना की जा सकती है।
एक्टिविस्ट ने क्या आरोप लगाए?
शो में संजीव श्रीवास्तव ने आरोप लगाया कि उन्होंने इस मुद्दे को लेकर मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, कृषि विभाग, उद्यान निदेशालय और प्रधानमंत्री कार्यालय समेत विभिन्न स्तरों पर शिकायतें भेजीं। उनका कहना है कि उन्हें इस कीमत के निर्धारण को लेकर संतोषजनक जवाब नहीं मिला। उनका मुख्य सवाल यह है कि अगर समान क्षमता का कोई उपकरण खुले बाजार में काफी कम कीमत पर उपलब्ध है, तो सरकारी योजना में उसकी यूनिट कॉस्ट इतनी अधिक क्यों निर्धारित की गई? उन्होंने यह भी आशंका जताई कि यदि किसी उपकरण की लागत वास्तविक बाजार मूल्य से काफी अधिक निर्धारित होती है, तो सब्सिडी व्यवस्था के जरिए सरकारी धन के इस्तेमाल और किसानों पर पड़ने वाले वित्तीय बोझ की जांच जरूरी हो जाती है। हालांकि, इन आरोपों को अभी आरोप के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड में अभी ऐसी आधिकारिक जांच रिपोर्ट सामने नहीं आई है, जिसमें इस योजना को वित्तीय फर्जीवाड़ा या घोटाला घोषित किया गया हो।
सरकारी योजना में टेंडर और एजेंसियों की भूमिका
इस मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य बिहार के उद्यान विभाग के आधिकारिक टेंडर रिकॉर्ड से सामने आता है। विभाग ने Solar Crop Dryers की विभिन्न क्षमताओं की सप्लाई, इंस्टॉलेशन, कमीशनिंग, ट्रेनिंग, वारंटी सपोर्ट और मेंटेनेंस के लिए OEMs और अधिकृत एजेंसियों के empanelment की प्रक्रिया शुरू की है। एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार प्रस्तावित सिस्टम 20 किलो से लेकर 1,000 किलो तक की अलग-अलग क्षमताओं में उपलब्ध कराने की योजना है। 100 किलो क्षमता वाले सिस्टम को SHGs, FPOs और ग्रामीण उद्यमों के लिए भी रखा गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि योजना में केवल एक साधारण ड्रायर की कीमत ही नहीं, बल्कि सप्लाई, इंस्टॉलेशन और बाद की सेवाओं का पूरा ढांचा भी महत्वपूर्ण हो सकता है। इसलिए ₹85 हजार या ₹1.21 लाख के किसी बाजार उत्पाद की तुलना सीधे ₹3.50 लाख के सरकारी सिस्टम से करने से पहले दोनों की तकनीकी specifications और scope की तुलना करना जरूरी है।
क्या होगी जांच?
फिलहाल इस पूरे विवाद का केंद्र यही है कि ₹3.50 लाख की यूनिट कॉस्ट कैसे तय हुई? सरकार को यदि इस पर उठ रहे सवालों का जवाब देना है तो यूनिट कॉस्ट का विस्तृत ब्रेकअप, टेंडर प्रक्रिया, चयनित कंपनियों की दरें और ड्रायर के तकनीकी specifications सार्वजनिक करना इस बहस को स्पष्ट कर सकता है। बिहार का DBT कृषि पोर्टल खुद योजनाओं के लाभ को सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में पहुंचाने और पारदर्शी व्यवस्था की बात करता है।
फिलहाल उपलब्ध तथ्यों के आधार पर इसे “सोलर क्रॉप ड्रायर योजना में घोटाला साबित” कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन सरकारी यूनिट कॉस्ट और बाजार में उपलब्ध समान क्षमता वाले उपकरणों की कीमत के बीच अंतर के आरोप निश्चित रूप से ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब दस्तावेजों और तकनीकी तुलना के जरिए दिया जाना चाहिए। यही जांच बताएगी कि कीमत का अंतर वास्तविक तकनीकी लागत की वजह से है या योजना की लागत निर्धारण प्रक्रिया में कोई अनियमितता हुई है।




