19 साल से 20 हजार से ऊपर का कोई चंदा नहीं… बसपा को लेकर रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

19 साल से 20 हजार से ऊपर का कोई चंदा नहीं… बसपा को लेकर रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

वित्त वर्ष 2024-25 में देश के राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को मिले चंदे के ताजा आंकड़ों ने भारतीय राजनीति की फंडिंग व्यवस्था को लेकर कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं। भारतीय जनता पार्टी एक बार फिर सबसे ज्यादा चंदा पाने वाली पार्टी के रूप में सामने आई है, जबकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस दूसरे स्थान पर है। लेकिन इस पूरी रिपोर्ट में सबसे चौंकाने वाला पहलू बहुजन समाज पार्टी को लेकर सामने आया है, जिसने लगातार 19 वर्षों से 20 हजार रुपये से अधिक का कोई दान नहीं मिलने का दावा किया है। यह पैटर्न 2024-25 में भी जारी रहा है, जिसने राजनीतिक फंडिंग की पारदर्शिता और प्रकृति पर नई बहस छेड़ दी है।

बीजेपी और कांग्रेस के बीच भारी अंतर

रिपोर्ट के अनुसार, 2024-25 में राष्ट्रीय दलों को कुल 6648.56 करोड़ रुपये का चंदा मिला, जो 11,343 दानदाताओं के जरिए आया। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा बीजेपी को मिला, जिसे 5,522 दानदाताओं से करीब 6074 करोड़ रुपये प्राप्त हुए। वहीं कांग्रेस को 2,501 दानदाताओं से करीब 517 करोड़ रुपये का चंदा मिला। दिलचस्प बात यह है कि दोनों दलों के दानदाताओं की संख्या में बहुत ज्यादा अंतर नहीं है, लेकिन कुल राशि में करीब 12 गुना का फर्क देखने को मिलता है। इससे यह संकेत मिलता है कि बीजेपी को मिलने वाले दान की राशि औसतन काफी अधिक है।

अन्य राष्ट्रीय दलों की स्थिति

रिपोर्ट में अन्य दलों के चंदे का भी विवरण दिया गया है। आम आदमी पार्टी को करीब 38.10 करोड़ रुपये का चंदा मिला, जो 2554 दानदाताओं से आया। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को लगभग 16.95 करोड़ रुपये और नेशनल पीपुल्स पार्टी को करीब 2.09 करोड़ रुपये का चंदा मिला। इन आंकड़ों से साफ है कि बड़ी पार्टियों और अन्य दलों के बीच आर्थिक संसाधनों का अंतर काफी बड़ा है, जो चुनावी प्रतिस्पर्धा को भी प्रभावित कर सकता है।

बसपा का अलग और चौंकाने वाला पैटर्न

रिपोर्ट का सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाला हिस्सा बसपा से जुड़ा है। पार्टी ने चुनाव आयोग को दिए अपने आंकड़ों में बताया है कि उसे 2024-25 में भी 20 हजार रुपये से अधिक का कोई चंदा प्राप्त नहीं हुआ। यह लगातार 19वां साल है, जब बसपा ने ऐसा दावा किया है। यानी पार्टी ने बड़े दानों को पूरी तरह शून्य दिखाया है और केवल छोटे दानों को ही दर्शाया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इतने लंबे समय तक एक ही तरह का डेटा सामने आना असामान्य है और इससे फंडिंग के स्रोतों और प्रकृति को लेकर सवाल उठते हैं।

कुल चंदे में जबरदस्त बढ़ोतरी

रिपोर्ट के अनुसार, 2023-24 के मुकाबले 2024-25 में राष्ट्रीय दलों के कुल चंदे में करीब 4104 करोड़ रुपये (161%) की वृद्धि हुई है। बीजेपी के चंदे में 171% की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जबकि कांग्रेस के चंदे में 84% की वृद्धि हुई। वहीं आम आदमी पार्टी और नेशनल पीपुल्स पार्टी जैसे दलों में भी प्रतिशत के लिहाज से बड़ी बढ़ोतरी देखने को मिली।

कॉरपोरेट दान का बढ़ता प्रभाव

रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि राजनीतिक दलों को मिलने वाले कुल चंदे में कॉरपोरेट दान का दबदबा बना हुआ है। 2024-25 में कुल चंदे का करीब 92% हिस्सा कॉरपोरेट या व्यापारिक संस्थाओं से आया, जबकि व्यक्तिगत दान का हिस्सा अपेक्षाकृत कम रहा। बीजेपी को सबसे ज्यादा कॉरपोरेट चंदा मिला, जो अन्य सभी दलों के कुल कॉरपोरेट दान से कई गुना अधिक है। इससे यह संकेत मिलता है कि कॉरपोरेट सेक्टर का राजनीतिक फंडिंग में बड़ा प्रभाव है।

किन राज्यों से मिला सबसे ज्यादा चंदा

राज्यों के हिसाब से देखें तो दिल्ली राजनीतिक दलों को चंदा देने में सबसे आगे रही, जहां से 2639 करोड़ रुपये से अधिक का दान मिला। इसके बाद महाराष्ट्र और गुजरात जैसे बड़े आर्थिक राज्यों का स्थान रहा। यह आंकड़े बताते हैं कि देश के आर्थिक रूप से मजबूत राज्यों से ही राजनीतिक दलों को सबसे ज्यादा फंडिंग प्राप्त होती है।

टॉप दानदाताओं में ट्रस्ट और कंपनियां

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सबसे बड़े दानदाताओं में कई इलेक्टोरल ट्रस्ट और कॉरपोरेट कंपनियां शामिल हैं।प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट, प्रोग्रेसिव इलेक्टोरल ट्रस्ट और एबी जनरल इलेक्टोरल ट्रस्ट जैसे संगठनों ने बड़ी राशि का योगदान दिया। इसके अलावा सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और वेदांता जैसी कंपनियों का नाम भी प्रमुख दानदाताओं में शामिल है।

क्या कहते हैं ये आंकड़े

इन आंकड़ों ने एक बार फिर भारतीय राजनीति में फंडिंग की पारदर्शिता, असमानता और स्रोतों को लेकर बहस छेड़ दी है। जहां एक ओर कुछ दलों को भारी मात्रा में चंदा मिल रहा है, वहीं दूसरी ओर बसपा जैसे दल का डेटा पूरी तरह अलग तस्वीर पेश करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में राजनीतिक फंडिंग को और अधिक पारदर्शी बनाने के लिए सख्त नियमों और निगरानी की जरूरत हो सकती है। ‘यह रिपोर्ट न केवल राजनीतिक दलों की आर्थिक स्थिति को उजागर करती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि चुनावी राजनीति में धन की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण और जटिल हो चुकी है।

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