मिडिल ईस्ट का युद्ध और ‘सूचना का मोर्चा’: जब AI बन रहा है दुष्प्रचार का हथियार

मिडिल ईस्ट का युद्ध और ‘सूचना का मोर्चा’: जब AI बन रहा है दुष्प्रचार का हथियार

द फ्रंट डेस्क: मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष को आमतौर पर मिसाइलों, ड्रोन और बमों के युद्ध के रूप में देखा जाता है, लेकिन इसके साथ-साथ एक और महत्वपूर्ण लड़ाई भी चल रही है—सूचना का युद्ध। आधुनिक दौर में युद्ध केवल मैदानों में ही नहीं लड़े जाते, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया और इंटरनेट पर भी लड़े जाते हैं। इसी सूचना युद्ध में भारत को भी घसीटने की कोशिशें सामने आई हैं। पिछले कुछ दिनों में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (ट्विटर) पर कई वीडियो तेजी से वायरल हुए, जिनमें दावा किया गया कि भारत ने इज़राइल को ईरान से जुड़े सैन्य या समुद्री ठिकानों की जानकारी दी है। कुछ पोस्ट में यह भी कहा गया कि भारत के शीर्ष नेता इस संघर्ष में किसी एक पक्ष के साथ खड़े हैं। हालांकि जब इन दावों की जांच की गई तो पाया गया कि इनमें से कई वीडियो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से बनाए गए डीपफेक वीडियो थे और इनका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं था। यह घटनाक्रम दिखाता है कि आज के दौर में डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फैलने वाली जानकारी कितनी तेजी से लोगों की धारणा को प्रभावित कर सकती है। युद्ध के दौरान ऐसी सूचनाएं अक्सर राजनीतिक और रणनीतिक उद्देश्यों से फैलायी जाती हैं।

फर्जी वीडियो में भारतीय नेताओं का इस्तेमाल

इन वायरल वीडियो में भारत के कई प्रमुख चेहरों का इस्तेमाल किया गया। इन वीडियो का उद्देश्य ऐसा माहौल बनाना था, जिससे लगे कि भारत इस संघर्ष में किसी एक पक्ष के समर्थन में सक्रिय भूमिका निभा रहा है।

उदाहरण के तौर पर, विदेश मंत्री एस. जयशंकर के नाम से एक वीडियो वायरल किया गया, जिसमें उन्हें पश्चिम एशिया के युद्ध को लेकर कथित बयान देते हुए दिखाया गया। बाद में फैक्ट-चेक में यह वीडियो पूरी तरह फर्जी साबित हुआ।

इसी तरह भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी के नाम से भी एक वीडियो फैलाया गया। इसमें दावा किया गया कि भारत ने इज़राइल को ईरानी जहाजों और सैन्य गतिविधियों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी दी है। जांच में यह दावा भी गलत निकला।

कुछ सोशल मीडिया पोस्ट में तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय सेना से जुड़े अधिकारियों के कथित बयान भी दिखाए गए, जिनका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं था।

भारत सरकार की आधिकारिक फैक्ट-चेक इकाई PIB Fact Check ने इन सभी वीडियो को पूरी तरह फर्जी और AI-जनरेटेड बताया। साथ ही चेतावनी दी कि इन वीडियो को संगठित तरीके से सोशल मीडिया नेटवर्क के माध्यम से फैलाया जा रहा है। इस तरह के वीडियो यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि भारत अंतरराष्ट्रीय संघर्षों में सक्रिय रूप से शामिल है, जबकि कई बार ऐसा दावा पूरी तरह निराधार होता है।

पाकिस्तानी नेटवर्क और संगठित दुष्प्रचार

कई साइबर विशेषज्ञों और डिजिटल विश्लेषण रिपोर्टों में संकेत मिले हैं कि इस तरह के कई वीडियो और पोस्ट पाकिस्तान से जुड़े नेटवर्क द्वारा फैलाए गए। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, लगभग 31 से अधिक हैक किए गए सोशल मीडिया अकाउंट्स का इस्तेमाल कर AI-जनरेटेड वीडियो और युद्ध से जुड़ी भ्रामक सूचनाएं फैलायी गईं। इन पोस्टों में यह संदेश देने की कोशिश की गई कि भारत इस संघर्ष में सक्रिय भूमिका निभा रहा है या किसी एक पक्ष के साथ खड़ा है। यह पहली बार नहीं है जब सोशल मीडिया पर इस तरह का दुष्प्रचार देखा गया हो। भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव के समय भी कई बार फर्जी युद्ध वीडियो वायरल किए गए हैं। विशेष रूप से 2019 के बाद कई बार पुराने युद्ध फुटेज या यहां तक कि वीडियो गेम के दृश्य भी “भारत-पाक युद्ध” के नाम से सोशल मीडिया पर फैलाए गए थे। बाद में इन वीडियो की जांच में पता चला कि उनका वास्तविक घटनाओं से कोई संबंध नहीं था। इस तरह की रणनीति का उद्देश्य केवल भ्रम फैलाना नहीं होता, बल्कि लोगों की भावनाओं को प्रभावित करना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किसी देश की छवि को नुकसान पहुंचाना भी होता है।

AI कैसे बन रहा है प्रचार का नया हथियार

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने सूचना तकनीक को जितना शक्तिशाली बनाया है, उतना ही यह दुष्प्रचार का नया माध्यम भी बन गया है।

आज AI तकनीक की मदद से कई ऐसे काम संभव हो गए हैं जो पहले बेहद मुश्किल थे। उदाहरण के लिए:

  • किसी भी व्यक्ति की आवाज़ को डिजिटल तरीके से क्लोन किया जा सकता है
  • किसी व्यक्ति के चेहरे को किसी भी वीडियो में जोड़कर नया वीडियो तैयार किया जा सकता है
  • और ऐसा बयान तैयार किया जा सकता है जो उस व्यक्ति ने कभी दिया ही नहीं

इस तकनीक को आमतौर पर डीपफेक (Deepfake) कहा जाता है।

कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में चेतावनी दी गई है कि चुनावों, युद्धों और राजनीतिक अभियानों में डीपफेक तकनीक का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। World Economic Forum समेत कई साइबर सुरक्षा संगठनों ने इसे आने वाले समय का सबसे बड़ा सूचना-सुरक्षा खतरा बताया है।

डीपफेक वीडियो इतनी वास्तविक दिखते हैं कि आम लोगों के लिए उन्हें पहचानना मुश्किल हो जाता है, जिससे गलत जानकारी तेजी से फैल जाती है।

भारत को क्यों बनाया जा रहा निशाना

मिडिल ईस्ट का मौजूदा संघर्ष मूल रूप से इज़राइल और ईरान के बीच है। हालांकि सोशल मीडिया पर फैलाए जा रहे कई वीडियो यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि भारत इस युद्ध में किसी एक पक्ष के साथ खड़ा है या सक्रिय भूमिका निभा रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे कई संभावित कारण हो सकते हैं:

  • भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को नुकसान पहुंचाना
  • भारत और ईरान जैसे देशों के बीच अविश्वास पैदा करना
  • भारत को ऐसे संघर्ष में घसीटना जिससे उसका सीधा संबंध नहीं है

सूचना युद्ध में यह एक पुरानी रणनीति है। कई बार भू-राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए झूठी या भ्रामक जानकारी फैलाकर वैश्विक स्तर पर भ्रम की स्थिति पैदा की जाती है।

डिजिटल प्लेटफॉर्म की तेजी और व्यापक पहुंच के कारण ऐसी अफवाहें बहुत कम समय में लाखों लोगों तक पहुंच जाती हैं।

सरकार की नई सख्ती

भारत में डिजिटल दुष्प्रचार और फर्जी कंटेंट को रोकने के लिए हाल के वर्षों में नियमों को और सख्त किया गया है।

2026 से लागू नए आईटी नियमों के तहत:

  • AI या डीपफेक सामग्री को स्पष्ट रूप से लेबल करना अनिवार्य होगा
  • भ्रामक या हानिकारक कंटेंट को कुछ घंटों के भीतर हटाना होगा
  • सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को ऐसे दुष्प्रचार के खिलाफ तेज और प्रभावी कार्रवाई करनी होगी

इन नियमों का उद्देश्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फैलने वाली गलत जानकारी को नियंत्रित करना और लोगों को भ्रमित होने से बचाना है।

आम लोगों को क्या सावधानी रखनी चाहिए

डिजिटल युग में जानकारी की बाढ़ के बीच सबसे बड़ी चुनौती है सही और गलत जानकारी के बीच फर्क करना।

विशेषज्ञों का मानना है कि आम लोगों को कुछ बुनियादी सावधानियां अपनानी चाहिए:

  • किसी भी सनसनीखेज वीडियो या खबर पर तुरंत विश्वास न करें
  • जानकारी को आधिकारिक स्रोतों या PIB Fact Check जैसे प्लेटफॉर्म पर जांचें
  • अगर किसी नेता का बयान दिखे तो देखें कि क्या वह उनके आधिकारिक अकाउंट पर भी मौजूद है
  • संदिग्ध वीडियो या पोस्ट को बिना जांच के आगे शेयर करने से बचें

इन सावधानियों से गलत जानकारी के प्रसार को काफी हद तक रोका जा सकता है।

असली युद्ध अब स्क्रीन पर भी लड़ा जा रहा है

आज की दुनिया में युद्ध केवल सीमाओं पर ही नहीं लड़े जाते। वे मोबाइल स्क्रीन, सोशल मीडिया टाइमलाइन और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी लड़े जाते हैं। मिडिल ईस्ट के मौजूदा संघर्ष ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब केवल तकनीकी नवाचार नहीं रहा, बल्कि प्रचार और दुष्प्रचार का एक शक्तिशाली हथियार भी बन चुका है। इस नए दौर में सबसे महत्वपूर्ण है सतर्कता, संदेह और तथ्यों की जांच। सही जानकारी तक पहुंचना और गलत जानकारी से बचना ही डिजिटल युग की सबसे बड़ी चुनौती और जिम्मेदारी बन गया है।

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