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उत्तराखंड पिटकुल विवाद: हाईकोर्ट के आदेश के बाद एमडी पीसी ध्यानी की छुट्टी, जानिए पूरा मामला

उत्तराखंड पिटकुल विवाद: हाईकोर्ट के आदेश के बाद एमडी पीसी ध्यानी की छुट्टी, जानिए पूरा मामला

द फ्रंट डेस्क: उत्तराखंड में पावर ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन ऑफ उत्तराखंड लिमिटेड (पिटकुल) के प्रभारी एमडी पीसी ध्यानी को लेकर सियासी और प्रशासनिक हलचल तेज हो गई है। हाईकोर्ट के आदेश के बाद सरकार ने उन्हें पद से हटा दिया और उनकी जगह अपर सचिव ऊर्जा मेहरबान सिंह बिष्ट को अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया। मामला तब और चर्चा में आया जब ध्यानी शुक्रवार को उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग की जनसुनवाई में बतौर एमडी शामिल हुए, लेकिन बीच में ही अचानक बैठक छोड़कर चले गए। कुछ ही घंटों बाद उन्हें हटाने की आधिकारिक खबर सामने आ गई।

क्या है पूरा घटनाक्रम?

हाईकोर्ट ने 18 फरवरी को पीसी ध्यानी को हटाने का आदेश दिया था। इस आदेश को लेकर अवमानना याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई भी निर्धारित थी। इसी बीच शासन ने 26 फरवरी की तारीख में आदेश जारी कर ध्यानी को एमडी पद से हटा दिया। ऊर्जा विभाग की ओर से जारी आदेश में कहा गया कि ध्यानी को 10 सितंबर 2022 को अस्थायी व्यवस्था के तहत प्रभारी एमडी बनाया गया था। अब उन्हें पद से हटाकर अपर सचिव ऊर्जा मेहरबान सिंह बिष्ट को पिटकुल का प्रभार सौंपा गया है। हालांकि आदेश की तारीख 26 फरवरी है, लेकिन 27 फरवरी को ध्यानी जनसुनवाई में एमडी के तौर पर उपस्थित रहे। यही तथ्य अब सवालों के घेरे में है।

जनसुनवाई में क्या हुआ?

शुक्रवार को करीब 12 बजे पीसी ध्यानी जनसुनवाई कक्ष में पहुंचे और यूजेवीएनएल के एमडी डॉ. संदीप सिंघल के पास बैठ गए। करीब एक घंटे तक वे बैठक में मौजूद रहे। लेकिन अचानक वे बैठक छोड़कर बाहर निकल गए। शुरू में इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया, लेकिन जैसे ही सोशल मीडिया पर हाईकोर्ट से जुड़ी खबरें सामने आईं, चर्चाएं तेज हो गईं। शाम तक शासन की ओर से उन्हें हटाने की पुष्टि भी हो गई। अब यह सवाल उठ रहा है कि अगर 26 फरवरी को ही हटाने का आदेश जारी हो चुका था, तो 27 फरवरी को वे जनसुनवाई में बतौर एमडी कैसे शामिल हुए?

हाईकोर्ट की नाराजगी और सरकार का कदम

हाईकोर्ट ने इस मामले में पहले ही नाराजगी जाहिर की थी। अवमानना याचिका की सुनवाई के बीच शासन का यह कदम सीधे अदालत के आदेश से जुड़ा माना जा रहा है। सरकार ने त्वरित कार्रवाई करते हुए मेहरबान सिंह बिष्ट को अतिरिक्त जिम्मेदारी दे दी है। लेकिन प्रशासनिक प्रक्रिया और आदेश की तारीख को लेकर पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं।

सियासी प्रतिक्रिया और विरोध प्रदर्शन

इस पूरे प्रकरण ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। ‘जन प्रहार’ नामक संगठन के कार्यकर्ताओं ने पिटकुल मुख्यालय के बाहर ऊर्जा मंत्री की भूमिका का विरोध करते हुए उनका प्रतीकात्मक पुतला दहन किया। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि यह मामला केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि शासन की जवाबदेही और न्यायालय के आदेशों के सम्मान से जुड़ा है। उन्होंने मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप कर जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। संगठन ने चेतावनी दी है कि अगर अवमानना प्रकरण में सख्त कार्रवाई नहीं हुई तो राज्यव्यापी आंदोलन किया जाएगा।

आगे क्या?

अब निगाहें सरकार की अगली रणनीति और हाईकोर्ट की कार्यवाही पर हैं। क्या सरकार इस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर करेगी? क्या अवमानना मामले में और सख्ती होगी? फिलहाल इतना स्पष्ट है कि पिटकुल का यह प्रकरण केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि न्यायालय, शासन और राजनीतिक जवाबदेही के बीच संतुलन की परीक्षा बन चुका है।

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