दिल्ली शराब घोटाला केस में केजरीवाल बरी, कोर्ट ने CBI की चार्जशीट पर उठाए गंभीर सवाल, जानें अहम बातें

दिल्ली शराब घोटाला केस में केजरीवाल बरी, कोर्ट ने CBI की चार्जशीट पर उठाए गंभीर सवाल, जानें अहम बातें

द फ्रंट डेस्क: दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने कथित आबकारी (शराब) नीति मामले में Arvind Kejriwal और मनीष सिसोदिया समेत अन्य आरोपियों को बरी कर दिया है। अदालत ने अपने विस्तृत आदेश में कहा कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की ओर से दायर चार्जशीट में ऐसे ठोस, प्रत्यक्ष और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए, जिनके आधार पर भ्रष्टाचार या आपराधिक साजिश के आरोप स्थापित किए जा सकें। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आपराधिक मुकदमे में आरोपों को केवल कथनों या आशंकाओं के आधार पर स्वीकार नहीं किया जा सकता, बल्कि उन्हें कानूनी कसौटी पर परखा जाना आवश्यक है।

क्या है कोर्ट का फैसला?

राउज एवेन्यू कोर्ट के स्पेशल जज जितेंद्र सिंह ने सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की दलीलों, दस्तावेजों और गवाहों के बयानों का विस्तृत परीक्षण किया। आदेश में कहा गया कि प्रस्तुत साक्ष्यों और लगाए गए आरोपों के बीच स्पष्ट सामंजस्य दिखाई नहीं देता। अदालत के अनुसार, चार्जशीट में कई गंभीर खामियां हैं और जिन तथ्यों को कथित साजिश का आधार बताया गया, वे न्यायिक परीक्षण में टिक नहीं पाए। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि केवल किसी नीति में बदलाव या प्रशासनिक निर्णय को आपराधिक साजिश का रूप नहीं दिया जा सकता, जब तक कि उसके समर्थन में प्रत्यक्ष प्रमाण मौजूद न हों। इसी आधार पर अदालत ने सभी आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।

आरोप कब लगे और AAP पर क्या पड़ा असर?

यह मामला वर्ष 2022 में उस समय सुर्खियों में आया, जब दिल्ली की 2021-22 की नई आबकारी नीति को लेकर अनियमितताओं के आरोप लगाए गए। दिल्ली के उपराज्यपाल की सिफारिश पर CBI ने केस दर्ज किया और जांच शुरू हुई। बाद में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने भी मनी लॉन्ड्रिंग के पहलू से जांच की। जांच के दौरान मनीष सिसोदिया सहित कई लोगों की गिरफ्तारी हुई और राजनीतिक तौर पर मामला और गंभीर हो गया। केजरीवाल को भी आरोपी बनाया गया, जिससे यह विवाद राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया। इस पूरे घटनाक्रम का असर सीधे Aam Aadmi Party पर पड़ा। पार्टी के शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारी से प्रशासनिक कार्य प्रभावित हुए, विपक्ष ने इसे भ्रष्टाचार का बड़ा मुद्दा बनाया और चुनावी सभाओं में लगातार उठाया। राजनीतिक विमर्श में यह मामला केंद्र बनाम दिल्ली सरकार के टकराव का प्रतीक भी बन गया।

‘बिना ठोस सबूत फंसाया गया’

अदालत ने अपने आदेश में टिप्पणी की कि केजरीवाल को बिना बुनियादी और ठोस प्रमाण के आरोपी बनाया गया। जज ने कहा कि किसी संवैधानिक पद पर रहे व्यक्ति के खिलाफ आरोप तय करने से पहले अभियोजन पक्ष को उच्च स्तर की प्रमाणिकता प्रस्तुत करनी चाहिए। कोर्ट के अनुसार, उपलब्ध रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रत्यक्ष या निर्णायक साक्ष्य सामने नहीं आया जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि वे कथित आपराधिक साजिश का हिस्सा थे। न्यायालय ने यह भी कहा कि कानून की नजर में सभी समान हैं, लेकिन आरोप सिद्ध करने का दायित्व पूरी तरह अभियोजन पर होता है।

चार्जशीट पर सख्त टिप्पणी

कोर्ट ने CBI की हजारों पन्नों की चार्जशीट पर भी गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि कई दावे ऐसे हैं जो गवाहों के बयानों से मेल नहीं खाते और कुछ आरोप अनुमान पर आधारित प्रतीत होते हैं। मुख्य आरोपी कुलदीप सिंह को बरी करते हुए जज ने टिप्पणी की कि जब उनके खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य नहीं थे, तो उन्हें आरोपी बनाए जाने का औचित्य स्पष्ट नहीं है। मनीष सिसोदिया के खिलाफ भी नीति निर्माण और उसे लागू करने की प्रक्रिया में कथित गड़बड़ी को लेकर कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य या आपराधिक लाभ की ठोस रिकवरी नहीं दिखाई गई।

‘कबूलनामा कहां है?’ – कोर्ट की नाराजगी

सुनवाई के दौरान जज जितेंद्र सिंह ने कहा, “कभी-कभी जब आप बहुत सारी फाइलें पढ़ते हैं तो फाइल आपसे बात करने लगती है।” उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि कथित कबूलनामा और प्रमुख गवाहों की सूची को लेकर स्पष्टता नहीं थी। अदालत ने एजेंसी से पूछा कि जिन बयानों को महत्वपूर्ण बताया जा रहा है, वे रिकॉर्ड पर स्पष्ट रूप से क्यों उपलब्ध नहीं हैं। एजेंसी की ओर से यह कहा गया कि कुछ जानकारी सीलबंद लिफाफे में दी गई थी, लेकिन कोर्ट ने इस पर असंतोष जताते हुए कहा कि अभियोजन की थ्योरी ठोस प्रमाणों के अभाव में केवल अनुमान जैसी प्रतीत होती है।

अदालत में कौन-कौन पेश हुआ?

मनीष सिसोदिया की ओर से सीनियर एडवोकेट रेबेका एम जॉन और विवेक जैन ने पैरवी की, जबकि केजरीवाल की ओर से सीनियर एडवोकेट एन. हरिहरन और मुदित जैन ने पक्ष रखा। बचाव पक्ष ने दलील दी कि पूरी जांच राजनीतिक प्रेरित थी और आरोपों को साबित करने योग्य कोई ठोस साक्ष्य मौजूद नहीं है। अदालत के इस फैसले के बाद दिल्ली की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है। जहां AAP इसे न्यायिक प्रक्रिया में विश्वास की जीत बता रही है, वहीं विपक्ष और जांच एजेंसियों की अगली कानूनी रणनीति पर भी सबकी नजरें टिकी हुई हैं। यह मामला अब केवल एक नीति विवाद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली, राजनीतिक जवाबदेही और संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका को लेकर व्यापक चर्चा को जन्म दिया है।

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