लक्ष्मी शंकर बाजपेयी | एक कवि, जिसने शोर के बीच चुप्पी को बचाए रखा

लक्ष्मी शंकर बाजपेयी | एक कवि, जिसने शोर के बीच चुप्पी को बचाए रखा

सालों पहले की एक शांत शाम। एक कमरे में टेबल लैम्प की पीली रोशनी है, कुछ किताबें खुली पड़ी हैं और एक आदमी शब्दों से जूझ रहा है। बाहर की दुनिया शोर कर रही है—नारे हैं, दावे हैं, सत्ताएं हैं। लेकिन इस कमरे में लिखी जा रही कविता किसी से टकराने नहीं, किसी को सुनने के लिए है। यह कविता जल्दी असर नहीं करना चाहती, यह भीतर टिक जाना चाहती है। यह आदमी कोई और नहीं, लक्ष्मी शंकर बाजपेयी हैं।

लक्ष्मी शंकर बाजपेयी उस पीढ़ी के कवि हैं, जिन्होंने कविता को सजावट नहीं बनने दिया। उन्होंने कविता को अनुभव से जोड़ा—ऐसे अनुभव से, जो देखा गया, जिया गया और फिर शब्दों में उतरा। उनके लिए कविता मंच पर तालियाँ बटोरने का साधन नहीं, बल्कि अपने समय से ईमानदारी से बात करने का तरीका रही है। वे जानते थे कि अगर कविता भी झूठ बोलने लगे, तो मनुष्य पूरी तरह अकेला हो जाएगा।

उनका साहित्यिक जीवन केवल कविता तक सीमित नहीं रहा। आलोचना और संपादन के क्षेत्र में भी उन्होंने गंभीर काम किया। साहित्यिक पत्रिकाओं से उनका गहरा जुड़ाव रहा, जहाँ उन्होंने न केवल लिखा, बल्कि नए लेखन को समझा, परखा और दिशा दी। यही कारण है कि उनका लेखन जल्दबाज़ी में नहीं लिखा गया साहित्य है, बल्कि सोच-समझकर रचा गया विचार है।

उनकी कविता में प्रेम है, लेकिन वह आँख मूँद लेने वाला प्रेम नहीं। वह ऐसा प्रेम है, जो सवाल करता है, जिम्मेदारी निभाता है और कभी-कभी पीड़ा को भी स्वीकार करता है। उनकी पंक्तियों में समाज की सच्चाइयाँ हैं—सत्ता की चालाकियाँ हैं, मनुष्य की असुरक्षाएँ हैं और वह बेचैनी भी है, जिसे अक्सर शब्द नहीं मिलते। वे बड़े स्वर में नहीं बोलते, लेकिन जो कहते हैं, वह देर तक भीतर गूंजता रहता है।

लक्ष्मी शंकर बाजपेयी की भाषा उनकी सबसे बड़ी ताकत है। न कठिन शब्दों का दिखावा, न अलंकारों की चकाचौंध। उनकी हिंदी सहज है, सच्ची है और पाठक से दूरी नहीं बनाती। ऐसा लगता है जैसे वे कविता नहीं पढ़ा रहे, बल्कि सामने बैठकर जीवन पर बात कर रहे हों। यही वजह है कि उनकी कविताएँ केवल पढ़ी नहीं जातीं—वे पाठक के साथ चलने लगती हैं।

उनका लेखन अपने समय से आँख नहीं चुराता। वे न तो यथार्थ से भागते हैं और न ही उसे सुंदर बनाकर पेश करते हैं। वे जानते हैं कि सच अक्सर असुविधाजनक होता है, लेकिन कविता का काम उसी सच के साथ खड़ा होना है। इसलिए उनकी कविताएँ नारे नहीं बनतीं—वे आईना बन जाती हैं, और पाठक खुद को उसमें देख लेता है।

आज के समय में, जब कविता भी त्वरित प्रभाव, वायरल होने और सतही लोकप्रियता की दौड़ में शामिल होती जा रही है, लक्ष्मी शंकर बाजपेयी का लेखन ठहरने की सीख देता है। वह याद दिलाता है कि कविता अभी भी मनुष्य की संवेदना, उसकी स्मृति और उसकी चेतना को बचा सकती है। उनका लेखन इस विश्वास को मजबूत करता है कि साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समय की आत्मा है।

लक्ष्मी शंकर बाजपेयी को याद करना किसी एक कवि को याद करना नहीं है। यह उस परंपरा को याद करना है, जिसमें शब्द सत्ता के नहीं, सच के साथ खड़े होते हैं। उनके शब्द आज भी जीवित हैं, क्योंकि उन्होंने कविता को काग़ज़ तक सीमित नहीं रखा—उसे जीवन का हिस्सा बना दिया। आज, उनके जन्मदिन पर, यह सिर्फ बधाई नहीं है।
यह उस कवि को सलाम है, जिसने शोर के इस दौर में भी कविता को चुपचाप सच्चा बनाए रखा।

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